
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कहा कि वह अगले सप्ताह उस याचिका पर सुनवाई करेगा, जिसमें मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार को मामले की पूरी सुनवाई होने तक अपने पद के कार्यों से अलग रखने की मांग की गई है।
वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह ने मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत के समक्ष मामले का उल्लेख करते हुए जल्द सुनवाई की तारीख देने की मांग की। वह याचिकाकर्ता राकेश कुमार सिंह की ओर से पेश हुए। सिंह ने अदालत से कहा कि चुनाव आयोग को तीन सदस्यों की टीम के रूप में काम करना चाहिए। फैसले सामूहिक रूप से लिए जाने चाहिए—या तो सभी की सहमति से या फिर मतभेद होने की स्थिति में बहुमत के आधार पर। उन्होंने कहा कि जिस तरह से घटनाक्रम सामने आया है, उससे यह गंभीर सवाल उठता है कि वास्तव में ऐसा हो रहा है या नहीं।
मुख्य न्यायाधीश ने संक्षेप में कहा कि मामले को अगले सप्ताह सूचीबद्ध किया जाएगा।
याचिका में अदालत से मांग की गई है कि मामले के लंबित रहने तक ज्ञानेश कुमार को मुख्य चुनाव आयुक्त के रूप में कार्य करने से रोका जाए। इस दौरान चुनाव आयोग के बाकी दो चुनाव आयुक्तों—सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी—को आपसी सहमति से आयोग चलाने की अनुमति देने की मांग की गई है। यदि कोई पद खाली होता है, तो याचिका में कहा गया है कि नई नियुक्ति ऐसी समिति के माध्यम से होनी चाहिए, जिसमें भारत के मुख्य न्यायाधीश भी शामिल हों।
इस पूरे मामले की वजह ऐसी रिपोर्टें हैं, जिनमें कहा गया है कि पिछले साल अक्टूबर से इस साल अगस्त के बीच चुनाव आयोग के नाम पर करीब 14 फैसले लिए गए, जबकि चुनाव आयुक्तों सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने इन फैसलों पर अपनी आपत्तियां दर्ज कराई थीं।
याचिका में दोनों चुनाव आयुक्तों की लिखित टिप्पणियों और औपचारिक संवाद का हवाला दिया गया है। इन आपत्तियों में ऐसे पत्रों और आदेशों का मुद्दा शामिल है, जो कथित तौर पर उनकी सहमति के बिना जारी किए गए। इसके अलावा, ऐसी बैठकों का भी जिक्र है जिनमें उचित एजेंडा या बैठक की कार्यवाही दर्ज नहीं की गई थी।
मामले में फॉर्म 6 में किए गए बदलावों का भी उल्लेख है। फॉर्म 6 का इस्तेमाल मतदाता सूची में नाम दर्ज कराने के लिए किया जाता है। इसके अलावा बड़े मतदाता डेटाबेस पर नियंत्रण, IT से जुड़े कामों के आवंटन में बदलाव और पश्चिम बंगाल में चुनाव आयोग के नाम से ट्रिब्यूनल के सामने दायर की गई अपीलों को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं।
याचिका का मूल तर्क यह है कि संविधान चुनाव कराने की शक्ति किसी एक व्यक्ति को नहीं, बल्कि पूरे चुनाव आयोग को देता है। चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति और सेवा शर्तों से संबंधित 2023 का कानून भी सामूहिक निर्णय प्रक्रिया की बात करता है। जहां सदस्यों के बीच मतभेद हो, वहां बहुमत के आधार पर फैसला लिया जाना चाहिए।
याचिका में अदालत से यह भी पूछा गया है कि ज्ञानेश कुमार किस अधिकार के तहत ऐसे कार्य कर रहे थे, जैसे कि इन शक्तियों का इस्तेमाल अकेले उनके पास हो।
अंतरिम रोक की मांग के अलावा याचिका में चुनाव आयोग की मूल फाइलें अदालत के सामने पेश करने की मांग भी की गई है। साथ ही, इन करीब 14 फैसलों को लेकर स्वतंत्र जांच की मांग की गई है। इसके लिए न्यायिक आयोग या सुप्रीम कोर्ट के किसी सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता में विशेष जांच दल (SIT) गठित करने की मांग की गई है।
यह सुप्रीम कोर्ट में दायर दूसरा मामला है, जिसमें ज्ञानेश कुमार के कार्यकाल के दौरान चुनाव आयोग के कामकाज पर सवाल उठाए गए हैं। इससे पहले एक अन्य याचिका में मतदाता सूचियों के बड़े स्तर पर किए जा रहे Special Intensive Revision (SIR) से जुड़े मामले में आपराधिक कार्रवाई की मांग की गई थी। इस प्रक्रिया के तहत देश के अलग-अलग हिस्सों में बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम हटाए जाने की बात सामने आई है और इसे लेकर राजनीतिक स्तर पर भी काफी विवाद हुआ है।
चुनाव आयोग ने कहा है कि तीनों सदस्यों के बीच मतभेद होना सामान्य बात है और मतदाता सूची के पुनरीक्षण सहित अंतिम फैसले सभी सदस्यों द्वारा मिलकर लिए गए हैं। रिपोर्ट सामने आने के बाद तीनों चुनाव आयुक्तों ने बैठक की थी और एक संयुक्त बयान भी जारी किया था। इसके साथ ही उनकी एक तस्वीर भी जारी की गई थी, जिसमें तीनों अधिकारी एक साथ खड़े दिखाई दिए।
हालांकि, याचिका में कहा गया है कि चुनाव आयुक्तों की लिखित आपत्तियां इस बात को लेकर गंभीर सवाल उठाती हैं कि क्या आयोग के नाम पर लिए गए कुछ फैसलों को वास्तव में पूरे आयोग का समर्थन हासिल था। याचिका में कहा गया है कि तीन चुनाव आयुक्तों वाली व्यवस्था का उद्देश्य ही यह सुनिश्चित करना है कि कोई एक व्यक्ति अकेले आयोग को संचालित न करे।
अगले सप्ताह जब सुप्रीम कोर्ट इस मामले की सुनवाई करेगा, तो सबसे पहले उसके सामने ज्ञानेश कुमार को फिलहाल मुख्य चुनाव आयुक्त के रूप में कार्य करने से रोकने की मांग होगी। इसके साथ ही अदालत को इस बड़े सवाल पर भी विचार करना होगा कि चुनाव आयोग को अपने फैसले किस प्रक्रिया के तहत लेने चाहिए।
याचिकाकर्ता ने यह भी मांग की है कि मामले से जुड़े सभी प्रासंगिक रिकॉर्ड सुरक्षित रखे जाएं, ताकि सुनवाई के दौरान कोई दस्तावेज या रिकॉर्ड गायब न हो।
फिलहाल, सुप्रीम कोर्ट द्वारा याचिका को अगले सप्ताह सूचीबद्ध करने के फैसले का मतलब है कि ये सभी सवाल जल्द ही खुली अदालत में सामने आएंगे। चुनाव आयोग की चुनाव प्रक्रिया में केंद्रीय भूमिका को देखते हुए, इस मामले की अगली सुनवाई पर नजर रहेगी।
स्रोत: द ट्रिब्यून, लाइव लॉ, डेक्कन क्रॉनिकल, द इंडियन एक्सप्रेस, न्यूजएक्स, WION, इकोनॉमिक टाइम्स, आउटलुक इंडिया।
@रोहित मनराल