
सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर कर मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार को तत्काल निलंबित करने की मांग की गई है। याचिका में यह भी कहा गया है कि भारत निर्वाचन आयोग (Election Commission of India) को किसी एक व्यक्ति के फैसले के आधार पर नहीं, बल्कि सामूहिक रूप से काम करना चाहिए।
राकेश कुमार सिंह की ओर से संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत दायर इस याचिका में उन रिपोर्टों का हवाला दिया गया है, जिनके अनुसार अक्टूबर 2025 से अगस्त 2026 के बीच तीन सदस्यीय निर्वाचन आयोग के नाम पर करीब 14 फैसले लिए गए, जबकि अन्य दो चुनाव आयुक्तों—सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी—ने इन फैसलों पर लिखित रूप से अपनी आपत्तियां दर्ज कराई थीं। याचिका के अनुसार, ये आपत्तियां कई महीनों तक सामने आती रहीं और कुछ मामलों में एक ही दिन में एक से अधिक बार दर्ज की गईं। इसके बावजूद कदम ऐसे उठाए गए, जैसे पूरे आयोग ने उन पर सहमति दे दी हो।
याचिकाकर्ता की मूल दलील यह है कि संविधान का अनुच्छेद 324 चुनावों की “अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण” की जिम्मेदारी “एक आयोग” को देता है, न कि किसी एक व्यक्ति को। हालांकि अनुच्छेद 324(3) के तहत मुख्य चुनाव आयुक्त आयोग के अध्यक्ष होते हैं, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि वे स्वयं पूरे आयोग के समान हो जाते हैं। याचिका में quo warranto की रिट जारी करने की मांग की गई है—यानी ज्ञानेश कुमार से यह बताने को कहा जाए कि वे किस अधिकार के तहत इस तरह कार्य कर रहे थे, मानो आयोग की सामूहिक शक्तियां अकेले उनके पास हों।
याचिका में जांच पूरी होने तक उन्हें निलंबित करने, निर्वाचन आयोग के मूल संस्थागत रिकॉर्ड अदालत के सामने पेश करने और एक स्वतंत्र न्यायिक जांच आयोग या सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता में विशेष जांच दल (SIT) गठित करने की भी मांग की गई है। इस जांच के जरिए यह पता लगाने की मांग की गई है कि वे 14 फैसले किस तरह लिए गए।
यह इस विषय से जुड़ी अकेली याचिका नहीं है। कुछ दिन पहले अधिवक्ता शैलेंद्र मणि त्रिपाठी ने भी सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था। यह कदम द इंडियन एक्सप्रेस की उस रिपोर्ट के बाद उठाया गया, जिसमें संधू और जोशी की लिखित आपत्तियों का जिक्र किया गया था। उनकी याचिका का मुख्य फोकस मतदाता सूची के Special Intensive Revision (SIR) पर है।
इस याचिका में मांग की गई है कि ऐसे किसी भी फैसले, दिशा-निर्देश, निर्देश या सॉफ्टवेयर बदलाव को असंवैधानिक और शुरू से ही शून्य घोषित किया जाए, जो पूरे आयोग की सहमति के बिना या बहुमत की राय के खिलाफ किए गए हों। इसमें जनप्रतिनिधित्व अधिनियम (Representation of the People Act) की धारा 32 के तहत आपराधिक कार्यवाही शुरू करने और कथित तौर पर बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम हटाए जाने की जांच के लिए SIT गठित करने की मांग भी की गई है।
दोनों याचिकाओं में एक ही महत्वपूर्ण कानूनी प्रावधान का उल्लेख किया गया है—Chief Election Commissioner and Other Election Commissioners (Appointment, Conditions of Service and Term of Office) Act, 2023 की धारा 18। इस धारा के अनुसार, यदि आयोग के सदस्यों के बीच किसी मुद्दे पर मतभेद होता है, तो बहुमत की राय मान्य होती है।
दलील सीधी है—अगर तीन में से दो चुनाव आयुक्त किसी फैसले पर रिकॉर्ड में आपत्ति दर्ज कर रहे हैं, तो फिर उस फैसले को पूरे आयोग के नाम से कैसे जारी किया जा सकता है?
उठाए गए मुद्दे केवल प्रक्रिया तक सीमित नहीं हैं। पहले वाली याचिका में मतदाता पंजीकरण के लिए इस्तेमाल होने वाले वैधानिक Form 6 में बदलाव, स्थानीय Electoral Registration Officers के पास मौजूद कुछ शक्तियों के केंद्रीकरण, कथित तौर पर उचित नियम संशोधन के बिना सॉफ्टवेयर में नए बदलाव और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में सामने आई कुछ समस्याओं का भी उल्लेख किया गया है।
वहीं, राकेश कुमार सिंह की नई याचिका का फोकस ज्यादा स्पष्ट रूप से संस्थागत सवाल पर है—क्या मुख्य चुनाव आयुक्त अकेले उन शक्तियों का इस्तेमाल कर सकते हैं, जिन्हें संविधान ने एक आयोग के रूप में निर्वाचन आयोग को सौंपा है?
इन मामलों पर नजर रखने वाले लोगों को याद होगा कि सुप्रीम कोर्ट पहले भी CEC और अन्य चुनाव आयुक्तों की आपसी स्थिति पर फैसला दे चुका है। टी.एन. शेषन मामले में अदालत ने स्पष्ट किया था कि चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के बाद आयोग एक बहु-सदस्यीय संस्था बन जाता है और CEC के पास वीटो की शक्ति नहीं होती। 2023 के कानून में बहुमत के सिद्धांत को वैधानिक रूप भी दिया गया।
मौजूदा याचिकाएं इस सवाल को अदालत के सामने रख रही हैं कि क्या पिछले एक साल के दौरान इस सिद्धांत का वास्तव में पालन किया गया।
निर्वाचन आयोग ने कहा है कि उसके फैसले उचित तरीके से लिए गए थे। हालांकि, दो चुनाव आयुक्तों की लिखित आपत्तियों का अस्तित्व अब मीडिया रिपोर्टों के माध्यम से सार्वजनिक रिकॉर्ड का हिस्सा बन चुका है। याचिकाकर्ता चाहते हैं कि अदालत मूल फाइलों, नोटिंग्स, मंजूरियों और सर्वर लॉग्स को देखकर इस सवाल का समाधान करे।
आम मतदाताओं के लिए इसका महत्व सीधा है। मतदाता सूची यह तय करती है कि किसे वोट देने का अधिकार है। अगर इन सूचियों को संशोधित करने या उन्हें मैनेज करने वाले सॉफ्टवेयर में बदलाव की प्रक्रिया पूरे आयोग की सहमति के बिना हो रही है, तो निष्पक्षता और संस्थागत विश्वसनीयता से जुड़े सवाल उठना स्वाभाविक है।
इसी वजह से याचिकाओं में केवल पुराने फैसलों को लेकर घोषणाएं करने की मांग नहीं की गई है, बल्कि उचित जांच की भी मांग की गई है, ताकि अगर ऐसा कोई पैटर्न मौजूद है तो वह आगे जारी न रहे।
सुप्रीम कोर्ट ने अभी तक निलंबन की मांग वाली नई याचिका को सूचीबद्ध नहीं किया है और न ही इस पर नोटिस जारी किया है। संवैधानिक संस्थाओं से जुड़े मामलों में अदालतें आम तौर पर सावधानी से आगे बढ़ती हैं। हालांकि, याचिका दाखिल होने के साथ ही चुनाव आयोग में सामूहिक बनाम एकतरफा निर्णय लेने का सवाल औपचारिक रूप से न्यायिक विचार के सामने आ गया है।
आखिरकार, निर्वाचन आयोग एक स्वतंत्र और बहु-सदस्यीय संस्था के रूप में काम करने के लिए बनाया गया है, जिस पर राजनीतिक स्पेक्ट्रम के अलग-अलग हिस्सों में भरोसा कायम रहना महत्वपूर्ण है। जब तीन में से दो सदस्य लगातार अपनी आपत्तियां दर्ज कर रहे हों और इसके बावजूद फैसले आयोग के नाम से जारी हो रहे हों, तो सुप्रीम कोर्ट से यह जांच कराने की मांग उठना स्वाभाविक है कि संवैधानिक और वैधानिक व्यवस्था का पालन हो रहा है या नहीं। यही इन याचिकाओं का मूल आधार है।
अब सुप्रीम कोर्ट अंतरिम निलंबन की मांग स्वीकार करता है या नहीं, रिकॉर्ड पेश करने का आदेश देता है या स्वतंत्र जांच का गठन करता है—यह आगे की न्यायिक प्रक्रिया में तय होगा। फिलहाल इतना स्पष्ट है कि निर्वाचन आयोग में पारदर्शिता और सामूहिक कार्यप्रणाली की मांग अब औपचारिक याचिकाओं के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुकी है।
स्रोत:
LiveLaw (28 सितंबर 2026)
The Indian Express (25 सितंबर 2026)
Business Standard (25 सितंबर 2026)
India Today (26 सितंबर 2026)
WION (28 सितंबर 2026)
The Tribune (28 सितंबर 2026)
@रोहित मनराल