सोनम वांगचुक और उनकी पत्नी गीतांजलि आंग्मो। यह उस शख्स की कहानी है जिसने वर्षों तक हिमालयी समुदाय के लिए जी-जान से काम किया—किसानों के लिए पानी बचाने वाले आइस स्तूप बनाए, अपने नवाचारों से लाखों लोगों को प्रेरित किया और 3 Idiots जैसी फिल्म से भी एक खास पहचान हासिल की। आज वही इंसान कई हफ्तों से अन्न त्यागने के बाद अस्पताल के बिस्तर पर बेहद कमजोर हालत में है। और उसके पास खड़ी है उसकी पत्नी, जो सिर्फ अपने पति के लिए न्याय और सम्मान चाहती है। इसी मकसद से वह दिल्ली हाई कोर्ट तक पहुंच गई हैं।
सोनम वांगचुक ने जून 2026 के आखिर में दिल्ली के जंतर-मंतर पर अपना अनशन शुरू किया। उन्होंने Cockroach Janta Party के युवा प्रदर्शनकारियों का साथ दिया, जो देश की शिक्षा व्यवस्था में फैली खामियों से बेहद आहत हैं। NEET सहित कई बड़ी परीक्षाओं के पेपर लीक ने हजारों छात्रों का भविष्य दांव पर लगा दिया। बच्चे वर्षों तक मेहनत करते हैं, परिवार कोचिंग पर लाखों रुपये खर्च करते हैं, लेकिन पेपर लीक, भ्रष्टाचार, बढ़ती फीस और छात्रों की आत्महत्याओं जैसी त्रासदियों के कारण सब कुछ बिखर जाता है। प्रदर्शनकारियों की मांग थी कि शिक्षा मंत्री इसकी जिम्मेदारी लें। वहीं सोनम ने लद्दाख के लोगों के लिए संवैधानिक सुरक्षा की मांग भी इस आंदोलन के साथ जोड़ दी। यह कोई दिखावा नहीं था, बल्कि एक गंभीर और शांतिपूर्ण विरोध था।

तीन सप्ताह बीतते-बीतते उनके शरीर ने जवाब देना शुरू कर दिया। 18 जुलाई को पुलिस उन्हें सफदरजंग अस्पताल ले गई। अधिकारियों का कहना था कि यह कदम उनकी जान बचाने के लिए जरूरी था क्योंकि उनकी सेहत लगातार गिर रही थी, डॉक्टर चिंतित थे और अदालत पहले भी उनकी स्वास्थ्य निगरानी के निर्देश दे चुकी थी। लेकिन उनके समर्थकों का मानना है कि 20 जुलाई को प्रस्तावित संसद मार्च से ठीक पहले इस तरह अस्पताल ले जाना आंदोलन को कमजोर करने की कोशिश थी। उन्होंने इसे जबरन उठाया जाना बताया। विपक्षी नेताओं ने भी इस पर सवाल उठाए। इस पूरे घटनाक्रम के बीच गीतांजलि आंग्मो अपने पति के सम्मान और अधिकारों के लिए मजबूती से खड़ी रहीं।
गीतांजलि आंग्मो हमेशा से सुर्खियों से दूर रही हैं। वह एक सोशल एंटरप्रेन्योर और शिक्षाविद हैं तथा सोनम वांगचुक के साथ मिलकर Himalayan Institute of Alternatives की सह-संस्थापक हैं। दोनों ने मिलकर कठिन हिमालयी क्षेत्रों में जमीनी स्तर पर बदलाव लाने का काम किया है। लेकिन आज वह अस्पताल में अपने पति के साथ खड़ी हैं और बेहद स्पष्ट शब्दों में अपनी बात रख रही हैं। उनका कहना है कि अस्पताल ले जाए जाने से एक दिन पहले तक सोनम की तबीयत ठीक थी। उनका आग्रह है कि परिवार की सहमति और उन डॉक्टरों की राय के बिना, जो शुरू से उनके स्वास्थ्य की निगरानी कर रहे थे, सोनम को न तो मुंह से कुछ दिया जाए और न ही नसों के जरिए कोई उपचार किया जाए। उन्होंने मेडिकल रिपोर्ट साझा न किए जाने और अस्पताल में मोबाइल फोन तक ले जाने पर रोक जैसे मुद्दों पर भी चिंता जताई है।
गीतांजलि चाहती हैं कि सोनम को सफदरजंग अस्पताल से किसी दूसरे, संभवतः निजी अस्पताल में स्थानांतरित किया जाए, जहां उन्हें अधिक भरोसा, पारदर्शिता और परिवार की भागीदारी महसूस हो। उनका उद्देश्य इलाज का विरोध करना नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि इलाज उनके पति की इच्छा, उनके साझा मूल्यों और गरिमा का सम्मान करते हुए हो। अस्पताल से भी सोनम का हौसला कमजोर नहीं पड़ा है। उन्होंने इस आंदोलन को देश के युवाओं पर मंडरा रहे अन्याय और भय से मुक्ति की दिशा में एक “दूसरा स्वतंत्रता आंदोलन” बताया है। अस्पताल के भीतर से भी उनकी आवाज़ उनकी पत्नी के माध्यम से लोगों तक पहुंच रही है।
यह पूरा मामला अब सिर्फ एक व्यक्ति के स्वास्थ्य तक सीमित नहीं रह गया है। यह देश के लाखों परिवारों की उस पीड़ा को सामने लाता है, जो अपने बच्चों की पढ़ाई और भविष्य को लेकर हर दिन चिंता में जीते हैं। एक पेपर लीक या व्यवस्था की एक छोटी सी विफलता वर्षों की मेहनत, लाखों रुपये और अनगिनत सपनों को खत्म कर सकती है। यह गुस्सा सिर्फ एक परीक्षा का नहीं, बल्कि एक ऐसी व्यवस्था का है जो लगातार युवाओं को निराश कर रही है। सोनम का अनशन करना निश्चित ही आसान फैसला नहीं रहा होगा। यकीनन गीतांजलि ने भी, हर जीवनसाथी की तरह, उन्हें समझाने की कोशिश की होगी।
आंदोलन अब भी जारी है। दूसरे लोग भी अनशन पर बैठ रहे हैं। संसद मार्च की तैयारी जारी है। देशभर में लोग इस मुद्दे पर चर्चा कर रहे हैं। कुछ लोग आंदोलन का पूरा समर्थन कर रहे हैं, तो कुछ इसके तरीके और समय पर सवाल उठा रहे हैं। लेकिन लगभग सभी इस बात पर सहमत हैं कि शिक्षा व्यवस्था और क्षेत्रीय न्याय जैसे मुद्दों पर सिर्फ आवाज़ दबाने से काम नहीं चलेगा। समय रहते संवाद और ठोस समाधान ही इस स्थिति का रास्ता निकाल सकते हैं।

शांत क्षणों में एक सवाल मन में आता है—जब कोई व्यक्ति समाज की भलाई के लिए इतना बड़ा त्याग करता है, तो उसका असर उसके परिवार और रिश्तों पर क्या पड़ता होगा? इन कठिन दिनों में गीतांजलि आंग्मो जिस मजबूती से अपने पति के साथ खड़ी हैं, अदालत का दरवाजा खटखटा रही हैं और उनकी गरिमा की रक्षा के लिए आवाज़ उठा रही हैं, वह एक ऐसे रिश्ते की मिसाल है जो विश्वास, सम्मान और साझा उद्देश्य पर टिका हुआ है। वह सिर्फ अपने पति के स्वास्थ्य के लिए नहीं लड़ रहीं, बल्कि उनके आंदोलन के मूल उद्देश्य को भी जीवित रखने की कोशिश कर रही हैं।
भारत का इतिहास शांतिपूर्ण भूख हड़तालों का गवाह रहा है। लेकिन हर अनशन अपने साथ एक मानवीय कीमत भी लेकर आता है—परिवार की चिंता, अपनों की बेचैनी और यह उम्मीद कि यह संघर्ष किसी बेहतर बदलाव का कारण बनेगा। इस समय सोनम और गीतांजलि उसी कठिन दौर से गुजर रहे हैं। अदालत का फैसला जो भी हो, आने वाले दिन जैसे भी हों, उम्मीद यही है कि संवाद होगा, संवेदनशीलता होगी और शिक्षा व्यवस्था तथा लद्दाख के लोगों के लिए न्याय की दिशा में ठोस कदम उठाए जाएंगे।
क्योंकि आखिर में, हर बड़े आंदोलन के पीछे एक ऐसा इंसान होता है जिसे कोई पूरे दिल से प्यार करता है। और हर अदालत की याचिका के पीछे एक ऐसी पत्नी होती है, जो सिर्फ यही चाहती है कि उसके पति के साथ वही गरिमा और सम्मान बरता जाए, जिसके लिए उसने पूरी जिंदगी दूसरों के लिए संघर्ष किया।
स्रोत:
Indian Express, The Hindu, Reuters, NYT की जुलाई 2026 के मध्य की रिपोर्ट्स; PTI द्वारा गीतांजलि आंग्मो के बयान; Cockroach Janta Party के अपडेट्स और अदालत की कार्यवाही से संबंधित कवरेज।
@रोहित मनराल