
बर्मिंघम, यूके: पिछले सप्ताह जब लोग कार्यक्रम स्थल पर पहुंचने लगे, तब भी वहां पहाड़ी व्यंजनों की खुशबू फैली हुई थी। इनमें से ज्यादातर लोग कई साल पहले पहाड़ों को छोड़कर यहां आकर बस गए थे। कुछ लोग कई घंटे गाड़ी चलाकर पहुंचे थे, तो कुछ ने सुबह-सुबह ट्रेन पकड़ी थी। सभी के आने की एक खास वजह थी—पद्मश्री डॉ. प्रीतम भरतवाण की प्रस्तुति। उन्हें हर कोई जागर सम्राट के नाम से जानता है। उन्होंने दशकों से गढ़वाल और कुमाऊं की पारंपरिक जागर और पंवाड़ा लोक परंपराओं को जीवित रखने का काम किया है।
इस सांस्कृतिक शाम का आयोजन उत्तराखंड वेलफेयर ऑर्गनाइजेशन और शिल्पा प्रोडक्शन ने मिलकर किया था। जैसे ही प्रीतम भरतवाण मंच पर पहुंचे और पारंपरिक जागर व पंवाड़ों की प्रस्तुति शुरू की, पूरा हॉल शांत हो गया। यह वही खामोशी थी, जिसे केवल इन लोकगीतों को समझने और उनसे जुड़ाव रखने वाले लोग महसूस कर सकते हैं। इसके बाद तालियां बजनी शुरू हुईं। पहले धीमी, फिर धीरे-धीरे तेज होती गईं। यह केवल औपचारिक तालियां नहीं थीं, बल्कि अपनी संस्कृति और परंपराओं को पहचानने की खुशी थी।
उनकी आवाज में आज भी पहाड़ों की मिट्टी और हवा की खुशबू महसूस होती है। उन्होंने देवी-देवताओं, खेतों, नदियों और पहाड़ों की लंबी सर्दियों से जुड़े लोकगीत प्रस्तुत किए। वहां मौजूद कई लोगों के लिए यह सिर्फ एक संगीत कार्यक्रम नहीं था, बल्कि अपने पहाड़ों की यादों में लौटने जैसा अनुभव था। देवदार के पेड़ों और लकड़ियों के धुएं की खुशबू, गांव की शाम में गूंजते ढोल-दमाऊ की आवाज और अपनी मिट्टी से जुड़ी यादें एक बार फिर जीवंत हो उठीं। कार्यक्रम के बाद कई लोगों ने बताया कि उन्हें पता भी नहीं चला और उनकी आंखों में आंसू आ गए।
कार्यक्रम का सबसे खास और उत्साहपूर्ण पल तब आया, जब प्रीतम भरतवाण और उनके भाई सुरतम भरतवाण ने ढोल और दमाऊ उठाया। इन पारंपरिक वाद्य यंत्रों की गहरी गूंज ने पूरे हॉल को झंकृत कर दिया और लोग अपनी जगहों से खड़े हो गए। कुछ लोग गलियारों में ही नाचने लगे, तो कुछ संगीत की धुन पर झूमते और मुस्कुराते नजर आए। यह ऐसा एहसास था, जब अपनी पुरानी और परिचित संस्कृति अचानक फिर से करीब महसूस होने लगती है।
पूरी शाम कार्यक्रम का उत्साह बना रहा। इस अवसर पर अंजलि खरे, सुरतम भरतवाण और लोकप्रिय गढ़वाली गायक विवेक नौटियाल सहित कई अतिथि मौजूद रहे। विवेक नौटियाल अपने लोकप्रिय गीतों ‘द्यो लागी’, ‘रमझमा’ और ‘उड़िजा चखुली’ के लिए जाने जाते हैं। वह भी दर्शकों के बीच मौजूद रहे और लगातार हो रही तालियों में शामिल हुए। आयोजकों ने कलाकारों और उनकी पूरी टीम का गर्मजोशी से स्वागत किया और उन्हें सम्मानित भी किया।
कार्यक्रम के बाद प्रीतम भरतवाण ने अपने सहज और सीधे अंदाज में प्रवासी उत्तराखंडियों से अपील की कि वे अपने घरों में गढ़वाली और कुमाऊंनी भाषा बोलना जारी रखें। बच्चों को पुराने लोकगीत सिखाएं और अपनी संस्कृति से जोड़े रखें।
उन्होंने कहा, “अपनी भाषा और संस्कृति से जुड़े रहना केवल पुरानी यादों को संजोने की बात नहीं है। यह जानने की बात है कि हम कौन हैं और उन जड़ों का सम्मान करने की बात है, जो हमें हमारी पहचान देती हैं।”
उनकी बातों को वहां मौजूद लोगों ने बेहद ध्यान से सुना।
प्रीतम भरतवाण ने आयोजकों, स्वयंसेवकों और कार्यक्रम में शामिल हुए सभी लोगों का आभार व्यक्त किया। वह अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और यूरोप सहित कई देशों में विश्वविद्यालयों और सामुदायिक कार्यक्रमों के मंचों पर प्रस्तुति दे चुके हैं। इसके बावजूद बर्मिंघम जैसी शाम उनके लिए आज भी खास मायने रखती है। ऐसे आयोजन यह दिखाते हैं कि पहाड़ों से दूर रहने के बावजूद लोक परंपराओं के प्रति लोगों का जुड़ाव कम नहीं हुआ है।
इसी यूके यात्रा के दौरान उन्होंने लंदन में भी समय बिताया और वहां उत्तराखंड के लोगों से मुलाकात कर अपनी संस्कृति और परंपराओं से जुड़े रहने का संदेश दिया। जागर, पंवाड़ा और ढोल-दमाऊ की परंपराओं को जीवित रखने के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित करने वाले प्रीतम भरतवाण के लिए ये यात्राएं केवल संगीत कार्यक्रम नहीं हैं, बल्कि संस्कृति को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का माध्यम भी हैं।
वर्ष 2019 में उन्हें इसी योगदान के लिए पद्मश्री सम्मान से सम्मानित किया गया था। वह अब तक सैकड़ों लोकगीत रिकॉर्ड कर चुके हैं और अपने गृह क्षेत्र में संगीत सिखाने के केंद्र भी शुरू कर चुके हैं। वह लगातार यात्राएं करते रहते हैं, ताकि देहरादून से लेकर बर्मिंघम तक अगली पीढ़ी अपनी मिट्टी और अपनी संस्कृति की आवाज सुनती रहे।
इस पूरी शाम की सबसे खास बात यह रही कि कार्यक्रम बेहद सरल और पारंपरिक अंदाज में आयोजित किया गया था। यहां न तो किसी बड़े आधुनिक प्रोडक्शन का दिखावा था और न ही पारंपरिक संगीत को आधुनिक बनाने के लिए इलेक्ट्रॉनिक बीट्स का सहारा लिया गया। बस दो भाई अपने पारंपरिक वाद्य यंत्रों के साथ उस संगीत को प्रस्तुत कर रहे थे, जो उनकी मिट्टी और संस्कृति से निकला है। सामने ऐसे लोगों से भरा हॉल था, जिनके दिलों में आज भी वही लोकगीत बसे हुए हैं।
ऐसे समय में जब कई सांस्कृतिक परंपराएं आधुनिकता की दौड़ में अपनी मूल पहचान खोती जा रही हैं, इस तरह के आयोजन बेहद खास और जरूरी महसूस होते हैं।
शिल्पा प्रोडक्शन और उत्तराखंड वेलफेयर ऑर्गनाइजेशन के आयोजकों ने इस कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए पर्दे के पीछे काफी मेहनत की। कलाकार को बर्मिंघम लाने, कार्यक्रम स्थल की व्यवस्था करने और उत्तराखंड समुदाय को एक साथ जोड़ने का काम किया गया। कार्यक्रम में लोगों की शानदार मौजूदगी और उनके चेहरों पर दिखाई दे रही खुशी ने इस मेहनत को सफल साबित किया।
शिल्पा प्रोडक्शन की संस्थापक शिल्पा भट्ट ने कहा कि बर्मिंघम में मिले शानदार प्रतिसाद ने उत्तराखंड की संस्कृति को दुनिया भर में पहुंचाने के उनके संकल्प को और मजबूत किया है। उन्होंने भविष्य में भी इस तरह के और कार्यक्रम आयोजित करने की योजना जताई है, ताकि पहाड़ों के संगीत, भाषा और परंपराओं को दुनिया के अलग-अलग देशों में रहने वाले प्रवासी उत्तराखंडियों तक पहुंचाया जा सके।
प्रीतम भरतवाण ने भी शिल्पा भट्ट की इस पहल का स्वागत किया। उन्होंने कहा कि इस तरह के लगातार प्रयास गढ़वाल और कुमाऊं की जीवंत लोक परंपराओं को पहाड़ों से दूर भी जीवित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
प्रवासी उत्तराखंडियों के लिए यह शाम लंबे समय तक यादगार बनी रहेगी। कुछ लोग अपने पुराने लोकगीतों की रिकॉर्डिंग फिर से निकालेंगे, कुछ अपने बच्चों को जागर की कुछ पंक्तियां सिखाना शुरू करेंगे, तो कुछ अगली सुबह चाय के साथ बैठकर अपने पहाड़ों को याद करेंगे और महसूस करेंगे कि वे अपनी मातृभूमि से अब उतने दूर नहीं हैं।
प्रीतम भरतवाण ने एक बार फिर साबित किया कि पहाड़ों के संगीत को किसी अनुवाद की जरूरत नहीं है। यह सीधे दिल तक पहुंचता है, चाहे कोई टिहरी के किसी आंगन में बैठा हो या बर्मिंघम के किसी सामुदायिक हॉल में।
और जब तक लोग इसी तरह एकजुट होकर अपनी संस्कृति और परंपराओं का जश्न मनाते रहेंगे, तब तक पहाड़ों के ये पुराने लोकगीत पीढ़ी दर पीढ़ी और समंदर पार तक अपनी यात्रा जारी रखेंगे।
स्रोत:
- गढ़वाल पोस्ट, 29 अक्टूबर 2026
- अविकल उत्तराखंड, 27 अक्टूबर 2026
- सामुदायिक जानकारियों और कलाकार के स्थापित कार्यों से प्राप्त अतिरिक्त विवरण।
@रोहित मनराल