72वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों की घोषणा कुछ ही दिन पहले हुई और ढोली पहली ऐसी गढ़वाली फिल्म बन गई जिसने सर्वश्रेष्ठ गढ़वाली फिल्म के लिए रजत कमल (सिल्वर लोटस) पुरस्कार अपने नाम किया। उत्तराखंड के पहाड़ों के लिए यह बहुत बड़ी उपलब्धि है – जैसे वर्षों से स्थानीय कलाकारों और कहानीकारों का देखा हुआ सपना आखिरकार सच हो गया हो।
यह फिल्म हमारे अपने समाज और संस्कृति से जुड़ी एक बेहद भावुक कहानी कहती है। ढोली एक ऐसे परिवार की कहानी है जो पीढ़ियों से पारंपरिक ढोल वादन करता आया है। यही ढोल की थाप शादियों, त्योहारों और मंदिरों के आयोजनों में पूरे गढ़वाल की पहचान रही है। इनकी धुन हर किसी को खुशी और उत्साह से भर देती है, लेकिन विडंबना यह है कि इन्हें बजाने वाले कलाकारों को अक्सर वह सम्मान और गरिमा नहीं मिलती जिसके वे वास्तव में हकदार हैं। फिल्म में एक छोटा लड़का अपने पिता को इसी संघर्ष से गुजरते हुए देखता है और फिर अपने हुनर के दम पर बड़े सपने देखने का फैसला करता है। वह कड़ी मेहनत करता है, गांव से बाहर सफलता हासिल करता है और फिर वापस लौटकर समाज की सोच बदलने की कोशिश करता है। यह सिर्फ एक परिवार की कहानी नहीं, बल्कि उन सभी लोगों को सम्मान देने की कहानी है जो हमारी लोक परंपराओं को आज भी जीवित रखे हुए हैं।

इस फिल्म की सबसे खास बात इसकी सच्चाई और वास्तविकता है। इसकी पूरी शूटिंग सितंबर 2023 में उत्तरकाशी की खूबसूरत असीगंगा घाटी में हुई थी, जिसमें नाल्ड गांव और उसके आसपास के क्षेत्र शामिल हैं। पहाड़, गांव, स्थानीय लोग, पारंपरिक वेशभूषा और गढ़वाली बोली – सब कुछ बेहद स्वाभाविक और दिल से जुड़ा हुआ महसूस होता है। प्रसिद्ध गढ़वाली लोकगायक नरेंद्र सिंह नेगी की आवाज़ ने फिल्म के संगीत में और भी आत्मीयता भर दी है। स्थानीय कलाकारों और विभिन्न स्थानों से जुड़े समर्पित तकनीकी दल ने निर्देशक दिनेश पी. भोंसले और निर्माता सुनील नायक के नेतृत्व में मिलकर इस फिल्म को साकार किया।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने भी फिल्म की पूरी टीम को बधाई दी। उन्होंने कहा कि यह सम्मान उत्तराखंड की लोक संस्कृति, भाषा और विरासत को समर्पित एक गौरवपूर्ण उपलब्धि है। उनका मानना है कि यह पुरस्कार युवा कलाकारों को प्रेरित करेगा और यह साबित करता है कि गढ़वाली सिनेमा अब राष्ट्रीय स्तर पर अपनी अलग पहचान बनाने के लिए तैयार है। उन्होंने यह भी बताया कि राज्य की नई फिल्म नीति क्षेत्रीय फिल्मों के लिए नए अवसर लेकर आई है। इस नीति के तहत सब्सिडी, आसान अनुमति प्रक्रिया और स्थानीय कहानियों को बढ़ावा देने जैसी कई सुविधाएं दी जा रही हैं। खास तौर पर क्षेत्रीय फिल्मों के लिए किए गए खर्च का 50 प्रतिशत तक वापस देने का प्रावधान है, जिससे ढोली जैसी फिल्मों को आगे बढ़ने में बड़ी मदद मिल रही है।
यह उपलब्धि सिर्फ एक फिल्म की जीत नहीं है। ऐसा लगता है जैसे पहाड़ों में रहने वाले हर उस व्यक्ति के लिए एक नया दरवाज़ा खुल गया है जिसके पास सुनाने के लिए अपनी कोई कहानी है। वर्षों से गढ़वाली फिल्में सीमित दायरे में बनती और दिखाई जाती रही हैं, लेकिन अब राष्ट्रीय पहचान मिलने के बाद निश्चित रूप से अधिक लोग इन फिल्मों की ओर ध्यान देंगे। ढोली इससे पहले कोलकाता इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में भी प्रदर्शित हो चुकी थी, जिससे इसकी सफलता का सफर पहले ही शुरू हो गया था।

जब हम गांवों के उन ढोल वादकों के बारे में सोचते हैं, जिनकी ताल पीढ़ियों से हमारी संस्कृति का हिस्सा रही है, तो यह फिल्म उन्हें एक नई आवाज़ देती हुई दिखाई देती है। और यह राष्ट्रीय पुरस्कार इस बात का प्रमाण है कि उनकी आवाज़ भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
अगर आपको ढोली देखने का अवसर मिले, तो इसे जरूर देखें। इस फिल्म के माध्यम से आप पहाड़ों की खूबसूरती, वहां की संस्कृति और लोकजीवन को महसूस करेंगे, और शायद ढोल की वह मधुर थाप भी अपने दिल में हमेशा के लिए संजो लेंगे। फिल्म से जुड़े सभी कलाकारों, तकनीशियनों और उन गांवों को हार्दिक बधाई जिन्होंने इस फिल्म की शूटिंग का स्वागत किया। आज पूरा उत्तराखंड इस उपलब्धि का जश्न मना रहा है, और सच कहें तो हम सभी को इस खुशी का हिस्सा बनना चाहिए।
यही भारतीय सिनेमा की सबसे बड़ी खूबसूरती है – जहां बड़े और छोटे, शोर और सादगी, सभी कहानियों को अपनी पहचान बनाने का अवसर मिलता है। देवभूमि उत्तराखंड से ऐसी और भी कहानियां देश और दुनिया तक पहुंचती रहें, यही उम्मीद है।
स्रोत:
दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण, द प्रिंट, राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों की आधिकारिक घोषणाएं तथा उत्तराखंड सरकार के आधिकारिक बयान।
@रोहित मनराल