
नई दिल्ली: रूस के राजदूत डेनिस अलीपोव ने रविवार को दावा किया कि एक वरिष्ठ अमेरिकी अधिकारी ने भारत के बढ़ते प्रभाव को लेकर वॉशिंगटन की वास्तविक सोच अनजाने में जाहिर कर दी थी। NDTV Defence Summit में बोलते हुए उन्होंने इस साल की शुरुआत में हुए Raisina Dialogue में दिए गए एक बयान का जिक्र किया और उसे “Freudian slip” यानी अनजाने में सामने आई सोच बताया।
अलीपोव ने कहा, “मुझे लगता है कि इस साल Raisina Dialogue में अमेरिका के एक शीर्ष अधिकारी ने सार्वजनिक रूप से यह बात कही कि ‘अमेरिका भारत को अगला चीन नहीं बनने देगा’, यानी एक प्रतिस्पर्धी के रूप में। यह एक तरह का Freudian slip था।”
उन्होंने आगे कहा, “जैसे-जैसे भारत मजबूत होता जाएगा और आखिरकार एक सुपरपावर बनेगा — जो कि अपरिहार्य है — अमेरिका भारत को रोकने के लिए हर संभव कोशिश करेगा।”
जिस अमेरिकी अधिकारी की ओर अलीपोव इशारा कर रहे थे, वह अमेरिकी Deputy Secretary of State Christopher Landau हैं। मार्च में Raisina Dialogue में Landau ने कहा था कि अमेरिका चीन के मामले में करीब 20 साल पहले की गई गलतियों को दोहराना नहीं चाहता। उनके मुताबिक, वॉशिंगटन केवल अपने बाजार खोलकर किसी दूसरी एशियाई शक्ति को बढ़ते हुए नहीं देख सकता, जो बाद में कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों में अमेरिकी कंपनियों से व्यावसायिक प्रतिस्पर्धा करने लगे।
Landau ने कहा था कि अमेरिका भारत के साथ मिलकर उसकी क्षमता को सामने लाना चाहता है, लेकिन ऐसा अमेरिकी कर्मचारियों और अमेरिकी हितों की कीमत पर नहीं होना चाहिए।
अलीपोव ने इन टिप्पणियों को रूस से आने वाले तेल को लेकर भारत पर मौजूदा अमेरिकी दबाव से भी जोड़ा। उन्होंने Lindsey Graham Sanctioning Russia and Iran Act of 2026 का खास तौर पर जिक्र किया, जिसे राष्ट्रपति Donald Trump ने साइन किया है। इस कानून के तहत रूस से तेल और गैस खरीदना जारी रखने वाले देशों पर अमेरिका 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगा सकता है।
अलीपोव का तर्क था कि यह कदम सिर्फ रूस को नुकसान पहुंचाने के लिए नहीं, बल्कि भारत के बढ़ते प्रभाव को सीमित करने के उद्देश्य से भी उठाया जा रहा है।
उन्होंने NDTV से कहा, “भारत रूसी तेल रूस की खातिर नहीं खरीद रहा है। भारत रूसी तेल अपनी अर्थव्यवस्था और अपने लोगों के हित में खरीद रहा है, क्योंकि वह प्रतिस्पर्धी कीमत पर उपलब्ध है।”
उन्होंने भारत के रुख की तारीफ करते हुए इसे रणनीतिक स्वायत्तता का उदाहरण बताया।
अलीपोव ने कहा, “इसके जवाब में, मुझे लगता है कि भारत ने रणनीतिक स्वायत्तता और ताकत दिखाई है। अमेरिका ने इस कानून के जरिए रूस पर दबाव बनाने की बात कही है। यह अपने आप में बेतुका है। और अमेरिका यह बात बहुत अच्छी तरह जानता है। मेरा मानना है कि जैसे-जैसे भारत आगे बढ़ेगा, इस तरह की दबाव बनाने वाली रणनीतियां जारी रहेंगी और उनका इस्तेमाल बढ़ता जाएगा।”
रूसी राजदूत ने इस मौके पर भारत और रूस के बीच संबंधों की गहराई पर भी जोर दिया। भारत और सोवियत संघ के बीच राजनयिक संबंध 1947 में शुरू हुए थे और 1991 के बाद भी यह संबंध जारी रहे। अगले साल दोनों देशों के राजनयिक संबंधों को 80 साल पूरे हो जाएंगे।
अलीपोव ने भारत-रूस साझेदारी को ऐसे संबंध के रूप में बताया जो अल्पकालिक फायदे के बजाय भरोसे और निरंतरता पर आधारित है।
उन्होंने कहा, “भरोसा और सम्मान वे गुण हैं जो हमारे संबंधों की पहचान हैं। आप अविश्वसनीय साझेदारों के साथ कारोबार नहीं करते।”
उन्होंने आगे कहा, “इन सभी दशकों में हम ऐसे दोस्त रहे हैं जो एक-दूसरे के लिए भरोसेमंद साझेदार रहे हैं — सिर्फ रूस भारत के लिए नहीं, बल्कि दोनों एक-दूसरे के लिए। हमने कभी भी अपने संबंधों को तत्काल वैश्विक परिस्थितियों से नहीं जोड़ा और न ही अपने रिश्ते को कभी जीरो-सम गेम माना।”
अलीपोव ने 11 सितंबर को नई दिल्ली में हुए BRICS Summit के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के बीच हुई हालिया मुलाकात का भी जिक्र किया। उन्होंने इसे इस बात के प्रमाण के तौर पर पेश किया कि दोनों देशों के रिश्तों का एजेंडा अभी भी व्यापक है।
अलीपोव ने BRICS को भी भारत और रूस जैसे देशों की उस व्यापक कोशिश का हिस्सा बताया, जिसका उद्देश्य वैश्विक निर्णय लेने की प्रक्रिया में अपनी आवाज को और मजबूत करना है।
ये बयान ऐसे समय में आए हैं जब भारत और अमेरिका के संबंध पहले की तुलना में ज्यादा जटिल हो गए हैं। टैरिफ, रूसी ऊर्जा से जुड़े सेकेंडरी प्रतिबंध और Trump प्रशासन के तहत ज्यादा लेन-देन आधारित रवैये ने पहले के अपेक्षाकृत गर्म रणनीतिक संबंधों की जगह ले ली है।
अमेरिकी अधिकारी अभी भी भारत को Indo-Pacific क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण साझेदार और चीन के मुकाबले एक संभावित संतुलनकारी शक्ति के रूप में देखते हैं। हालांकि, Landau की टिप्पणियों और Graham Act जैसे कानूनों ने कुछ राजधानियों में एक अलग तरह की व्याख्या को जन्म दिया है — कि वॉशिंगटन भारत के बढ़ते प्रभाव को केवल एक सीमा तक स्वीकार करने के लिए तैयार है।
भारत की ओर से लगातार यह रुख रहा है कि वह रियायती रूसी कच्चा तेल इसलिए खरीद रहा है क्योंकि इससे आर्थिक फायदा होता है। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर है। नई दिल्ली के अधिकारी कई बार स्पष्ट कर चुके हैं कि रूसी तेल की खरीद राष्ट्रीय हित से प्रेरित है, न कि किसी भू-राजनीतिक गठबंधन का हिस्सा।
रणनीतिक स्वायत्तता भारत की विदेश नीति का एक प्रमुख सिद्धांत बनी हुई है — यानी किसी एक देश पर निर्भर हुए बिना कई साझेदारों के साथ संबंध बनाए रखना।
अलीपोव का बयान रातों-रात किसी नीति को बदलने वाला नहीं है। लेकिन इसने उस असहज सवाल को और तेज कर दिया है जो पिछले कुछ महीनों से चर्चा में है।
क्या अमेरिका वास्तव में भारत को एक बड़ी वैश्विक शक्ति बनते देखना चाहता है, या फिर वह ऐसे भारत को पसंद करता है जो उसके लिए उपयोगी रहे, लेकिन पूरी तरह से प्रतिस्पर्धी शक्ति न बने?
रूसी राजदूत स्पष्ट रूप से मानते हैं कि इसका जवाब मार्च में अनजाने में सामने आ गया था और वह इसे खुलकर कहने से पीछे नहीं हट रहे हैं।
इस बयान को कोई उनकी व्याख्या माने या इसे बड़ी शक्तियों के बीच होने वाली सामान्य कूटनीतिक बयानबाजी के तौर पर देखे, लेकिन तनाव मौजूद है। भारत तेजी से बढ़ रहा है, उसकी अर्थव्यवस्था का विस्तार हो रहा है और वैश्विक स्तर पर उसका प्रभाव बढ़ रहा है।
वॉशिंगटन इस बदलती वास्तविकता को किस तरह संभालता है — वास्तविक साझेदारी, नियंत्रित प्रतिस्पर्धा या इन दोनों के बीच का कोई रास्ता — यह आने वाले वर्षों में भारत-अमेरिका संबंधों की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।
फिलहाल, रूसी राजदूत ने यह सुनिश्चित कर दिया है कि यह बातचीत सार्वजनिक और तीखी बनी रहे।
Sources:
- NDTV report on Russian Ambassador Denis Alipov’s remarks at the NDTV Defence Summit, September 27, 2026
- South China Morning Post and Bloomberg coverage of US Deputy Secretary of State Christopher Landau’s comments at the Raisina Dialogue, March 2026
- Reporting on the Lindsey O. Graham Sanctioning Russia and Iran Act of 2026
@रोहित मनराल