गहरी सड़न: SIR के दौरान चुनाव आयोग के कामकाज पर गंभीर सवाल

SIR चुनाव आयोग विवाद

SIR पूरी तरह विवादों में घिर चुका है, CEC ज्ञानेश कुमार को इस्तीफा देना चाहिए

मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी Special Intensive Revision (SIR) का मकसद मतदाता सूचियों को साफ और सटीक बनाना था। यानी कोई पात्र मतदाता सूची से बाहर न हो और कोई अपात्र व्यक्ति सूची में बना न रहे। यही इसका मूल उद्देश्य बताया गया था। लेकिन मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के नेतृत्व में जिस तरह से यह प्रक्रिया चलाई गई, उसने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। अब जब चुनाव आयोग के भीतर गहरे मतभेदों की खबरें सामने आ रही हैं, तो यह देखना मुश्किल हो गया है कि यह पूरी कवायद किस तरह पूरी तरह प्रभावित नहीं हुई होगी।

2025 में बिहार विधानसभा चुनाव से पहले SIR की शुरुआत की गई थी। बूथ लेवल अधिकारियों द्वारा घर-घर जाकर सत्यापन, फॉर्म भरवाना, ड्राफ्ट मतदाता सूची जारी करना, दावे और आपत्तियां दर्ज करना—पूरी प्रक्रिया अपनाई गई। इसके बाद इसे चरण-दर-चरण दूसरे राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों तक बढ़ाया गया। जब यह पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, दिल्ली और अन्य जगहों तक पहुंचा, तो हटाए गए नामों की संख्या काफी बड़ी दिखाई देने लगी। अलग-अलग चरणों में करोड़ों नाम मतदाता सूचियों से हटाए गए—कुछ मृत बताए गए, कुछ के स्थान बदलने की बात सामने आई और कुछ के विवरण का मिलान नहीं हो पाया।

विपक्षी दलों ने शुरुआत से ही इस प्रक्रिया पर सवाल उठाए। उनका आरोप था कि वास्तविक मतदाताओं, खासकर उन लोगों को जिनके विपक्ष के पक्ष में होने की संभावना है, मतदाता सूची से बाहर किया जा रहा है। चुनाव आयोग लगातार कहता रहा कि पूरी प्रक्रिया पारदर्शी है, राजनीतिक दलों के बूथ लेवल एजेंट इसकी निगरानी कर रहे हैं और अदालतों ने भी प्रक्रिया को आगे बढ़ने की अनुमति दी है। कागज पर यह सब ठीक दिखाई देता है। लेकिन इसके बाद खुद निर्वाचन सदन के भीतर से मतभेदों की खबरें सामने आने लगीं।

इसी सप्ताह सामने आई एक जांच रिपोर्ट ने पूरे मामले को और गंभीर बना दिया। रिपोर्ट के मुताबिक, अन्य दो चुनाव आयुक्तों—सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी—ने दस महीनों के दौरान कम से कम 14 बार अपनी आपत्तियां दर्ज की थीं। उनका कहना था कि कुछ फैसले और आदेश उन्हें जानकारी दिए बिना जारी किए जा रहे थे। नए मतदाताओं के लिए इस्तेमाल होने वाले बुनियादी आवेदन फॉर्म Form 6 में बदलाव, फील्ड अधिकारियों द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले डेटाबेस का केंद्रीकरण, नाम जोड़ने, हटाने और बहाल करने की प्रक्रिया तथा अपील की व्यवस्था को लेकर भी सवाल उठाए गए।

एक रिपोर्ट में तो यह भी बताया गया कि एक ही दिन में चार आपत्तियां दर्ज की गईं। यह चाय पर होने वाली सामान्य मतभिन्नता नहीं है। यह इस बात का बड़ा संकेत है कि तीन सदस्यीय चुनाव आयोग उस सामूहिक तरीके से काम नहीं कर रहा था, जिसकी अपेक्षा संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत की जाती है।

चुनाव आयोग की ओर से जवाब आया कि अलग-अलग विचार स्वस्थ चर्चा का हिस्सा हैं और अंतिम फैसले सर्वसम्मति से लिए गए। ठीक है। लेकिन जब तीन में से दो आयुक्त बार-बार यह औपचारिक रूप से दर्ज कर रहे हों कि कुछ फैसले उनकी जानकारी के बिना लिए जा रहे हैं, तो सर्वसम्मति का दावा सवालों के घेरे में आना स्वाभाविक है।

और इस पूरे मामले के केंद्र में CEC ज्ञानेश कुमार हैं।

वे 2023 के उस कानून के बाद नियुक्त होने वाले पहले मुख्य चुनाव आयुक्त हैं, जिसने चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति वाली चयन समिति में सरकार की भूमिका को बढ़ाया और मुख्य न्यायाधीश को उस प्रक्रिया से बाहर कर दिया। ज्ञानेश कुमार मार्च 2024 में चुनाव आयुक्त बने थे, ठीक लोकसभा चुनाव के कार्यक्रम से पहले। इसके बाद फरवरी 2025 में उन्होंने मुख्य चुनाव आयुक्त का पद संभाला।

उनका प्रशासनिक रिकॉर्ड मजबूत रहा है। वे केरल कैडर के IAS अधिकारी रहे हैं और केंद्र सरकार में सहकारिता मंत्रालय समेत कई महत्वपूर्ण पदों पर काम कर चुके हैं। लेकिन SIR के दौरान उनके काम करने के तरीके ने चुनाव आयोग की स्वतंत्रता को लेकर पहले से चले आ रहे सवालों को फिर सामने ला दिया है।

जरा इसके पैमाने पर गौर कीजिए। कुछ चरणों में एक करोड़ से ज्यादा नाम हटाए गए। एक आकलन के मुताबिक केवल 12 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में ही पांच करोड़ से ज्यादा नाम हटाए गए और कुछ अन्य जगहों पर प्रक्रिया अभी भी जारी थी। पश्चिम बंगाल में हटाए गए नामों की संख्या लाखों में पहुंची। दिल्ली में भी बड़ी संख्या में नोटिस जारी किए गए।

जमीन पर आम मतदाताओं और विपक्षी कार्यकर्ताओं की ओर से लगातार यह शिकायतें सामने आती रहीं कि प्रक्रिया जल्दबाजी में की गई, सत्यापन एक समान तरीके से नहीं हुआ और कुछ जगहों पर अपील के लिए समय भी काफी कम था।

चुनाव आयोग की ओर से इसके जवाब में कुछ चुनावों में संशोधित मतदाता सूचियों पर रिकॉर्ड मतदान का हवाला दिया गया और यह भी कहा गया कि सुप्रीम कोर्ट ने SIR की वैधता को बरकरार रखा है तथा बड़ी कानूनी चुनौतियां सफल नहीं हुईं। इसके बावजूद राजनीतिक तापमान कम नहीं हुआ।

राहुल गांधी के “वोट चोरी” के आरोप, चुनाव आयोग के साथ सार्वजनिक बयानबाजी, संसद में मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने के लिए पहले दिए गए नोटिस—इन सबने विवाद को लगातार बढ़ाया। वे नोटिस खारिज कर दिए गए, लेकिन उनके पीछे मौजूद असहजता खत्म नहीं हुई।

इस मामले को अलग बनाने वाली सबसे बड़ी बात यह है कि सवाल अब केवल बाहर से नहीं उठ रहे हैं। वे आयोग के भीतर से भी सामने आ रहे हैं।

जब दो अन्य चुनाव आयुक्तों को यह महसूस हो कि SIR को किस तरह आगे बढ़ाया जा रहा है, उस पर उन्हें औपचारिक रूप से आपत्ति दर्ज करनी पड़े—डेटा तक पहुंच, फॉर्म में बदलाव और मतदाता सूची के पुनरीक्षण की पूरी प्रक्रिया को लेकर—तो यह कवायद अपनी उस नैतिक विश्वसनीयता को खोने लगती है जिसका वह दावा करती है।

स्वच्छ और सही मतदाता सूची लोकतंत्र की बुनियाद है। इस बात पर किसी को असहमति नहीं होनी चाहिए। लेकिन अगर उसे तैयार करने वाली संस्था के बारे में यह धारणा बनने लगे कि वहां एक व्यक्ति ही ज्यादातर फैसले ले रहा है और बाकी सदस्य बाद में उन फैसलों तक पहुंचने की कोशिश कर रहे हैं, तो पूरी बुनियाद कमजोर नजर आने लगती है।

मतदाता इसे देखते हैं। राजनीतिक दल इसे देखते हैं। और जब भरोसा टूटता है, तो उसे दोबारा हासिल करना बेहद मुश्किल होता है।

ज्ञानेश कुमार ने SIR का मजबूती से बचाव किया है। उन्होंने अभूतपूर्व पारदर्शिता, BLOs और BLAs की निगरानी और दुनिया की सबसे शुद्ध मतदाता सूचियों की बात की है। ठीक है। लेकिन नेतृत्व का मतलब यह भी है कि संस्था खुद बंटी हुई नजर न आए।

डेटाबेस पर कथित केंद्रीकरण, महत्वपूर्ण आदेशों में सहयोगी आयुक्तों को कथित तौर पर शामिल न किए जाने जैसे मुद्दे मामूली प्रक्रियात्मक बातें नहीं हैं। ये सीधे उस सामूहिक निर्णय प्रक्रिया के केंद्र में जाते हैं, जिसका प्रतिनिधित्व चुनाव आयोग को करना चाहिए।

इस समय SIR सार्वजनिक धारणा में पूरी तरह विवादों से घिर चुका है। बहुत बड़ी संख्या में नाम हटाए गए हैं, लेकिन इस बात को लेकर पर्याप्त भरोसा नहीं बन पाया है कि हर पात्र नागरिक को उचित तरीके से अपनी बात रखने का मौका मिला। फैसले कैसे लिए गए, इसे लेकर भी कई सवाल खड़े हो चुके हैं।

इससे बाहर निकलने का सबसे साफ रास्ता यही है कि इस पूरी प्रक्रिया का नेतृत्व करने वाला व्यक्ति अपने पद से हट जाए। CEC ज्ञानेश कुमार को इस्तीफा देना चाहिए।

यह किसी राजनीतिक बदले या किसी व्यक्ति को निशाना बनाने की बात नहीं है। मुद्दा यह है कि अगले चुनावी दौर से पहले चुनाव आयोग को अपनी विश्वसनीयता दोबारा स्थापित करने की जरूरत है। एक पूरी तरह काम करने वाला तीन सदस्यीय आयोग, इन आंतरिक विवादों की छाया से बाहर, मतदाता सूची के बचे हुए पुनरीक्षण और भविष्य के ऐसे सभी अभियानों की जिम्मेदारी संभाले।

लोकतंत्र सिर्फ परिपूर्ण मतदाता सूचियों से नहीं चलता। वह भरोसे पर चलता है। इस समय वह भरोसा कमजोर पड़ रहा है और इससे पहले कि यह और गहरा हो, इस गहरी सड़न को खत्म करना जरूरी है।

स्रोत: सितंबर 2026 में The Indian Express की जांच रिपोर्ट, The Hindu, Economic Times, Tribune, Scroll.in तथा Special Intensive Revision प्रक्रिया को लेकर Election Commission of India की प्रेस नोट्स और आधिकारिक बयान।

@रोहित मनराल

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