सुप्रीम कोर्ट ने Form 6 में बदलाव पर स्थिति साफ की, CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विरोध के बीच नोटिस जारी

Supreme Court Form 6 Changes

मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ देशभर में चल रहे विरोध प्रदर्शनों के बीच सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने Form 6 में किए गए बदलावों को लेकर स्थिति साफ कर दी। कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि मतदाता सूची में नए मतदाताओं के नाम जोड़ने के लिए इस्तेमाल होने वाले Form 6 में किए गए किसी भी संशोधन को सुप्रीम कोर्ट ने मंजूरी नहीं दी है।

विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision-SIR) को लेकर पिछले कई हफ्तों से देश के अलग-अलग हिस्सों में विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं। विपक्षी दल CEC ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग कर रहे हैं। इसी मामले से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की बेंच ने चुनाव आयोग के भीतर फैसले लेने की प्रक्रिया पर भी सवालों को गंभीरता से लिया।

भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली इस बेंच में जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना भी शामिल हैं। कोर्ट के सामने दायर याचिकाओं में आरोप लगाया गया है कि ज्ञानेश कुमार ने अन्य दो चुनाव आयुक्तों—सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी—की उचित भागीदारी के बिना कुछ फैसले खुद लिए।

सुनवाई के दौरान मुख्य मुद्दों में से एक ECINET पोर्टल पर Form 6 में किया गया बदलाव था।

वरिष्ठ अधिवक्ता मेनका गुरुस्वामी ने कोर्ट को बताया कि Form 6 में अतिरिक्त सवाल जोड़े गए थे। इनमें यह पूछा जा रहा था कि क्या आवेदक, उसके माता-पिता या दादा-दादी का नाम पहले हुए SIR अभ्यासों के दौरान मतदाता सूची में शामिल था।

उन्होंने तर्क दिया कि यह बदलाव उचित कानूनी प्रक्रिया का पालन किए बिना किया गया। इस पर मुख्य न्यायाधीश ने तुरंत कहा, “आइए बिल्कुल स्पष्ट रहें। किसी भी संशोधित Form 6 को हमने मंजूरी नहीं दी है… जब रिकॉर्ड पेश किया जाएगा, तो हम यह देखना चाहेंगे कि किसने क्या संशोधित किया।”

कोर्ट की इस टिप्पणी से मामले को लेकर पैदा हुआ काफी भ्रम दूर हुआ। इससे कुछ दिन पहले चुनाव आयोग ने एक बयान जारी कर कहा था कि SIR अवधि के दौरान Form 6 के साथ लगाए गए घोषणा-पत्र को सुप्रीम कोर्ट ने बरकरार रखा है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने अब स्पष्ट कर दिया है कि उसने ऐसे किसी संशोधित Form 6 को मंजूरी नहीं दी थी।

Form 6, Registration of Electors Rules, 1960 के तहत एक वैधानिक फॉर्म है। इसमें वास्तविक बदलाव के लिए उचित प्रक्रिया का पालन किया जाना जरूरी है, जिसमें सरकार और संसदीय निगरानी से जुड़ी प्रक्रिया शामिल होती है। इसे केवल ऑनलाइन जोड़ देना पर्याप्त नहीं माना जा सकता।

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में चुनाव आयोग (ECI), केंद्र सरकार, CEC ज्ञानेश कुमार, दोनों अन्य चुनाव आयुक्तों, एक डिप्टी इलेक्शन कमिश्नर और DG IT को नोटिस जारी किया है। कोर्ट ने पूरा रिकॉर्ड पेश करने को कहा है, ताकि यह पता लगाया जा सके कि आखिर कौन-सा फैसला लिया गया, किसने लिया और क्या उस फैसले में कानून का पालन किया गया।

बेंच ने साफ किया कि अगर कोई फैसला सर्वसम्मति या बहुमत के बिना लिया गया पाया जाता है, तो उसे रद्द किया जा सकता है।

कोर्ट ने कहा, “हम सभी फैसलों की जांच करेंगे। अगर कोई फैसला कानून के अनुरूप नहीं है, तो हम उसे रद्द कर देंगे। आप जानते हैं कि कोर्ट के पास क्या शक्ति है।”

हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल ज्ञानेश कुमार को उनके पद से हटाने या मामले की सुनवाई लंबित रहने तक उन्हें काम करने से रोकने के लिए कोई अंतरिम आदेश देने से इनकार कर दिया। CJI ने कहा कि कोर्ट केवल अखबारों में प्रकाशित रिपोर्ट के आधार पर कार्रवाई नहीं कर सकता और पहले वास्तविक रिकॉर्ड देखना जरूरी है।

ये याचिकाएं सितंबर के अंत में प्रकाशित Indian Express की एक जांच रिपोर्ट के बाद सामने आईं। उस रिपोर्ट में बताया गया था कि सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने करीब दस महीनों के दौरान कम से कम 14 बार अपनी आपत्तियां रिकॉर्ड पर रखी थीं।

इन आपत्तियों में Form 6 में बदलाव, मतदाता सूची में नाम जोड़ने या हटाने की प्रक्रिया, चुनावी रोल के डेटाबेस तक पहुंच और SIR के दौरान उठाए गए अन्य कदम शामिल थे।

इनमें से एक चुनाव आयुक्त ने Form 6 में किए गए बदलाव को “अनधिकृत और अवैध” तक बताया था और इसे वापस लेने की मांग की थी। इसके बावजूद यह बदलाव कुछ समय तक ऑनलाइन उपलब्ध रहा।

CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन भी कई शहरों में जारी हैं। कांग्रेस कार्यकर्ताओं और अन्य विपक्षी समूहों ने मार्च निकाले, चुनाव आयोग के कार्यालयों तक पहुंचने की कोशिश की और उनके पद से हटाए जाने की मांग की। विपक्षी दलों का आरोप है कि इस पूरी प्रक्रिया से बड़ी संख्या में मतदाताओं के अधिकार प्रभावित हो सकते हैं।

कुछ जगहों पर पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को रोकने के लिए पानी की बौछार का इस्तेमाल किया और कई लोगों को हिरासत में भी लिया गया। पूर्व नौकरशाहों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के कुछ समूहों ने चुनाव आयोग के सामने अपनी ओर से एक “पीपुल्स चार्जशीट” पेश करने की भी कोशिश की है।

वहीं, चुनाव आयोग का कहना है कि SIR से जुड़े सभी बड़े फैसलों को पूरे आयोग की मंजूरी मिली थी और किसी संस्थान में अलग-अलग राय होना सामान्य बात है।

विवाद बढ़ने के बाद चुनाव आयोग ने यह भी घोषणा की कि अतिरिक्त घोषणा-पत्र केवल SIR अवधि के दौरान लागू होगा और बाकी मामलों में 1960 के नियमों के तहत मौजूद मूल Form 6 ही लागू रहेगा।

चुनाव आयोग से जुड़े सूत्रों ने यह भी कहा है कि मूल Form 6 में एक भी कॉमा तक नहीं बदला गया था। उनके मुताबिक, कुछ मामलों में केवल एक अलग घोषणा-पत्र जोड़ा गया था।

इसके बावजूद सोमवार को सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी ने CEC ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर चल रही आलोचना को एक बार फिर तेज कर दिया है। विपक्षी नेताओं ने कोर्ट की टिप्पणी को आधार बनाकर आरोप लगाया है कि Form 6 में किए गए बदलावों के पास उचित कानूनी आधार नहीं था।

कोर्ट ने संबंधित पक्षों से करीब एक सप्ताह के भीतर जवाब मांगा है और संकेत दिया है कि रिकॉर्ड मिलने के बाद वह पूरे मामले की गहराई से जांच करेगा।

पहली बार मतदाता सूची में अपना नाम दर्ज कराने की कोशिश कर रहे आम लोगों, खासकर उन युवा मतदाताओं के लिए जिनके परिवार के सदस्यों के नाम पुरानी मतदाता सूचियों में दर्ज नहीं रहे हैं, ऑनलाइन Form 6 में जोड़े गए अतिरिक्त सवाल व्यावहारिक परेशानी का कारण बन गए थे।

अब मुख्य सवाल यही है कि मतदाता सूची को साफ और अपडेट करने के लिए यह अतिरिक्त प्रक्रिया वास्तव में जरूरी थी या फिर यह कानून में दी गई सीमा से आगे चली गई थी। सुप्रीम कोर्ट अब इसी सवाल की जांच संबंधित रिकॉर्ड और दस्तावेजों के आधार पर करेगा।

जवाब और रिकॉर्ड दाखिल होने के बाद इस मामले की सुनवाई जल्द ही दोबारा होने की संभावना है। तब तक CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन जारी हैं और चुनाव आयोग के भीतर फैसले लेने की प्रक्रिया को लेकर उठे सवाल भी बने हुए हैं।

स्रोत: The Indian Express (5 और 6 अक्टूबर 2026 की रिपोर्ट तथा 23 सितंबर 2026 की पूर्व जांच रिपोर्ट), India Today, Business Standard, The Hindu BusinessLine, The Wire, News18, Economic Times, Hindustan Times, LiveLaw, Verdictum और Deccan Herald।

@रोहित मनराल

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Scroll to Top