
आमतौर पर कूटनीतिक मुलाकातों में औपचारिक उपहारों का आदान-प्रदान होता है। लेकिन इस बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कुछ ऐसा दिया, जो बेहद खास और व्यक्तिगत था। उन्होंने उज्बेकिस्तान के राष्ट्रपति शौकत मिर्जियोयेव को गोवा में पिछले साल हुए वर्ल्ड कप फाइनल में जवोखिर सिंदारोव की जीत की मूल हस्तलिखित स्कोरशीट भेंट की।
यानी वही असली कागज, जिस पर फाइनल मुकाबले के दौरान बोर्ड पर चली हर चाल दर्ज की गई थी। इसे एक साधारण लेदरेट कवर में रखा गया था। इसके साथ सिंदारोव की एक तस्वीर भी थी, जिसमें वह ट्रॉफी थामे और कंधों पर उज्बेकिस्तान का झंडा लपेटे नजर आ रहे हैं।
काफी खास तो है, है ना?
ऑल इंडिया चेस फेडरेशन (AICF) के प्रमुख नितिन नारंग ने इस पूरे पल को बेहद खूबसूरती से बयान किया। उन्होंने कहा कि आम तौर पर स्कोरशीट सिर्फ शतरंज की बिसात पर चली चालों का रिकॉर्ड होती है। लेकिन कभी-कभी वही कागज एक बहुत बड़ी कहानी का हिस्सा बन जाता है।
गोवा में सिंदारोव की ऐतिहासिक जीत से लेकर अब उसी स्कोरशीट के भारत के प्रधानमंत्री द्वारा उज्बेकिस्तान के राष्ट्रपति को उपहार में दिए जाने तक—शतरंज जिस तरह लोगों और देशों को जोड़ता है, उसकी यह एक अलग ही मिसाल है। नारंग ने इसे बिल्कुल सही शब्द दिए—“Chess diplomacy, quite literally.”
और वाकई, यह लाइन इस पूरे घटनाक्रम पर बिल्कुल फिट बैठती है।
गोवा से वर्ल्ड कप जीत और फिर कैंडिडेट्स तक सिंदारोव का सफर
थोड़ा पीछे चलते हैं। पिछले नवंबर में गोवा में युवा जवोखिर सिंदारोव ने इतिहास रचते हुए FIDE वर्ल्ड कप जीतने वाले सबसे कम उम्र के खिलाड़ी बनने का गौरव हासिल किया था।
फाइनल में चीन के वेई यी के खिलाफ क्लासिकल मुकाबले ड्रॉ रहे थे। इसके बाद टाईब्रेक में सिंदारोव ने जीत हासिल कर वर्ल्ड कप अपने नाम किया। इस जीत ने उन्हें कैंडिडेट्स टूर्नामेंट तक पहुंचाया।
और वहां भी उन्होंने बाजी मार ली।
अब इसी साल जिनेवा में सिंदारोव का सामना भारत के अपने विश्व चैंपियन डी. गुकेश से होगा। दो युवा खिलाड़ी, दो अलग-अलग देशों का प्रतिनिधित्व करते हुए, शतरंज के सबसे बड़े खिताब के लिए आमने-सामने होंगे।
ऐसे में उस स्कोरशीट की अहमियत और भी बढ़ जाती है।
मोदी के उज्बेकिस्तान दौरे में संस्कृति, संगीत और शतरंज का संगम
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यह खास उपहार अपने उस दौरे के दौरान दिया, जिसमें SCO Summit भी शामिल था।
स्कोरशीट के अलावा प्रधानमंत्री ने राष्ट्रपति मिर्जियोयेव को चंदन की लकड़ी से बना संतूर भी भेंट किया। यह वाद्ययंत्र उज्बेकिस्तान के पारंपरिक चांग वाद्ययंत्र जैसा दिखाई देता है।
इसके साथ एक खूबसूरत लकड़ी के बॉक्स में प्रीमियम कांगड़ा चाय भी उपहार में दी गई।
यानी इस पूरे आदान-प्रदान में संस्कृति, संगीत और भारतीय धरती पर रची गई शतरंज की एक ऐतिहासिक कहानी—तीनों शामिल थे।
यह सिर्फ एक औपचारिक कूटनीतिक उपहार जैसा नहीं लगा, बल्कि काफी सोच-समझकर चुना गया और व्यक्तिगत स्पर्श वाला gesture नजर आया।
जब शतरंज बना दो देशों के बीच पुल
शतरंज को हमेशा से सॉफ्ट पावर के एक माध्यम के तौर पर भी देखा जाता रहा है। दुनिया में कभी “पिंग-पोंग डिप्लोमेसी” की चर्चा होती थी। इस बार कुछ वैसा ही काम शतरंज की बिसात ने किया।
भारत ने उस टूर्नामेंट की मेजबानी की, जहां उज्बेकिस्तान के एक युवा खिलाड़ी ने इतिहास रचा। अब उसी इतिहास का कागजी रिकॉर्ड भारत के प्रधानमंत्री ने उज्बेकिस्तान के राष्ट्रपति को वापस सौंप दिया।
एक तरह से यह पूरा घटनाक्रम एक खूबसूरत फुल सर्कल जैसा है।
भारत और उज्बेकिस्तान दोनों ही शतरंज को गंभीरता से लेते हैं। भारत के पास मौजूदा विश्व चैंपियन गुकेश हैं और युवा खिलाड़ियों की एक पूरी पीढ़ी तेजी से आगे बढ़ रही है। वहीं उज्बेकिस्तान भी पिछले कई वर्षों से शतरंज की दुनिया में अपनी क्षमता से कहीं ज्यादा प्रभाव डालता रहा है और सिंदारोव इस समय उसके सबसे चमकदार सितारे हैं।
आने वाले समय में समरकंद में होने वाला अगला ओलंपियाड इस दोस्ताना प्रतिद्वंद्विता को और दिलचस्प बना सकता है।
साधारण सा कागज, लेकिन अपने अंदर बड़ी कहानी
शायद इस पूरे उपहार की सबसे खास बात यही है कि स्कोरशीट अपने आप में बेहद साधारण चीज होती है।
हर टूर्नामेंट में खिलाड़ी ऐसी सैकड़ों स्कोरशीट भरते हैं। कहीं जल्दबाजी में लिखी हुई चालें, कहीं छोटे-मोटे सुधार और कहीं खिलाड़ियों की अपनी लिखावट में दर्ज पूरा मुकाबला।
लेकिन सिंदारोव की यह स्कोरशीट अलग है।
इसने भारतीय जमीन पर उज्बेकिस्तान के लिए एक ऐतिहासिक पल को दर्ज किया था। और अब वही कागज उज्बेकिस्तान के राष्ट्रपति को भारत के प्रधानमंत्री ने सौंपा।
इस छोटे से gesture में एक संदेश छिपा हुआ है—हमने आपकी उपलब्धि देखी, उसका सम्मान किया और आपकी खुशी को साझा करने पर हमें भी गर्व है।
इसके लिए किसी बड़े भाषण की जरूरत नहीं थी।
शतरंज की एक चाल से आगे की कहानी
नितिन नारंग की बात इसलिए भी खास लगती है क्योंकि शतरंज वास्तव में लोगों को बहुत स्वाभाविक तरीके से जोड़ता है।
भारत और उज्बेकिस्तान दोनों देशों के बच्चे एक जैसी ओपनिंग सीखते हैं, एक जैसे बड़े खिलाड़ियों को फॉलो करते हैं और शतरंज की दुनिया में अपने सपने देखते हैं।
जब दो देशों के नेता किसी साझा आयोजन से जुड़ी इतनी व्यक्तिगत और अर्थपूर्ण चीज एक-दूसरे को देते हैं, तो वह सिर्फ कूटनीति नहीं रह जाती। वह दो दोस्तों के बीच किसी खास यादगार चीज को साझा करने जैसा महसूस होने लगता है।
बेशक, भारत और उज्बेकिस्तान के रिश्तों में व्यापार, कनेक्टिविटी, सुरक्षा और कई दूसरे गंभीर मुद्दे भी शामिल हैं। लेकिन ऐसे छोटे और मानवीय पल भी मायने रखते हैं।
वे लोगों को रिश्तों के बारे में कुछ गर्मजोशी भरी और वास्तविक बात करने का मौका देते हैं।
दोनों देशों के शतरंज प्रशंसकों के लिए यह सोचना ही खास है कि गोवा में हुए उस तनावपूर्ण फाइनल का कागजी रिकॉर्ड अब उज्बेकिस्तान के राष्ट्रपति के पास है—और उसे भारत के प्रधानमंत्री ने अपने हाथों से भेंट किया।
सिंदारोव की कहानी अभी जारी है
सिंदरोव का सफर लगातार आगे बढ़ रहा है।
एक युवा प्रतिभा से लेकर वर्ल्ड कप चैंपियन बनने तक, फिर कैंडिडेट्स चैंपियन बनने तक और अब गुकेश के खिलाफ विश्व खिताब की लड़ाई तक—उनकी कहानी में एक और दिलचस्प अध्याय जुड़ गया है।
जिनेवा में क्या होगा, यह तो आने वाला वक्त बताएगा। लेकिन उस मुकाबले से पहले ही इस कहानी में एक अनोखा अध्याय लिख दिया गया है।
एक साधारण सी स्कोरशीट, जो गोवा के खेल परिसर से निकलकर ताशकंद में भारत और उज्बेकिस्तान के शीर्ष नेतृत्व की मुलाकात तक पहुंच गई।
आखिर में…
यह पूरा घटनाक्रम याद दिलाता है कि खेल कूटनीति के लिए हमेशा बड़े स्टेडियम, भव्य कार्यक्रम या बड़े-बड़े मंच जरूरी नहीं होते।
कभी-कभी यह सिर्फ एक कागज का टुकड़ा होता है—जिस पर कुछ चालें लिखी होती हैं, जिसे किसी ने संभालकर रखा और सही समय पर सही व्यक्ति को सौंप दिया।
गोवा में लिखी गई शतरंज की चालें अब दो देशों के बीच एक खूबसूरत कहानी का हिस्सा बन चुकी हैं।
Chess diplomacy, quite literally.
और शायद यही इसकी सबसे खूबसूरत बात है।
@रोहित मनराल