ममता बनर्जी ने खोया पार्टी नाम और चुनाव चिन्ह, कांग्रेस का समर्थन और CJP की सहानुभूति

ममता बनर्जी TMC नाम और चुनाव चिन्ह

कल का दिन बंगाल की राजनीति में उन दिनों में से एक लगा, जब अचानक जमीन पैरों के नीचे से खिसकती हुई महसूस होती है। करीब तीन दशक पहले तृणमूल कांग्रेस को खड़ा करने वाली ममता बनर्जी ने सुबह उठकर देखा कि उनकी पार्टी का नाम और वह जाना-पहचाना घास और दो फूल वाला चुनाव चिन्ह चुनाव आयोग के आदेश के बाद फिलहाल उनके हाथ में नहीं रहा। नंदीग्राम और रेजीनगर में 6 अक्टूबर को होने वाले उपचुनावों के लिए ममता गुट और रितब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले बागी गुट, जिसमें अरूप रॉय भी शामिल हैं, दोनों को “ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस” नाम और पुराने चुनाव चिन्ह के इस्तेमाल से रोक दिया गया।

इसके बाद चुनाव आयोग ने दोनों गुटों को अस्थायी नाम और चुनाव चिन्ह दिए। ममता गुट अब “ममता ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस” के नाम से चुनाव लड़ेगा और उसे चुनाव चिन्ह के तौर पर फुटबॉल खिलाड़ी मिला है। वहीं दूसरे गुट को “डेमोक्रेटिक तृणमूल कांग्रेस” नाम और लिफाफा चुनाव चिन्ह दिया गया है। यह व्यवस्था फिलहाल अस्थायी है और तब तक रहेगी, जब तक यह बड़ी लड़ाई तय नहीं हो जाती कि असली तृणमूल कांग्रेस कौन है।

लेकिन जिस पार्टी की पहचान 1998 से उसी घास और दो फूल वाले चिन्ह से जुड़ी रही हो, उसके लिए यह फैसला बड़ा झटका है। ममता बनर्जी ने इसे लोकतंत्र के लिए काला दिन बताया। उन्होंने इसे असंवैधानिक और पक्षपातपूर्ण करार देते हुए आरोप लगाया कि इसके पीछे किसी दूसरी राजनीतिक पार्टी के हितों को फायदा पहुंचाने की कोशिश है। उन्होंने साफ किया कि उपचुनाव की प्रक्रिया शुरू हो जाने के कारण उनके गुट ने वैकल्पिक नाम और चुनाव चिन्ह जरूर दिए, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि वे इस फैसले को अंतिम रूप से स्वीकार करते हैं। उनका कहना है कि वे मूल नाम और चुनाव चिन्ह वापस पाने के लिए लड़ाई जारी रखेंगी।

कालीघाट में हुई प्रेस कॉन्फ्रेंस में उनके शब्दों में इस फैसले को लेकर दर्द साफ दिखाई दिया। उन्होंने बागी गुट पर पार्टी की “मां” के साथ विश्वासघात करने का आरोप लगाया और कहा कि अगर कोई वास्तव में तृणमूल कांग्रेस का सम्मान करता है, तो वह उसकी मां का अपमान करते हुए उसका चुनाव चिन्ह नहीं छीनेगा और उसे अनाथ नहीं बनाएगा।

ममता के लिए यह मामला व्यक्तिगत भी है। उन्होंने कांग्रेस से अलग होने के बाद अपनी पार्टी खड़ी की थी। इतने वर्षों से जिस नाम और चुनाव चिन्ह के साथ मतदाताओं ने उन्हें जोड़ा है, उसे खोना उनके लिए अपनी राजनीतिक विरासत से जुड़े एक बड़े हिस्से को खोने जैसा है।

लेकिन राजनीति में नुकसान के साथ-साथ नए समीकरण भी बनते हैं। चुनाव आयोग के फ्रीज आदेश के तुरंत बाद अलग-अलग जगहों से समर्थन की आवाजें आने लगीं। लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी भी सामने आए। दोनों नेताओं के बीच पिछले वर्षों में रिश्ते हमेशा सहज नहीं रहे हैं, लेकिन राहुल गांधी ने इस मुद्दे को सिर्फ ममता बनर्जी या एक पार्टी का मामला नहीं बताया।

उन्होंने कहा कि यह लड़ाई केवल ममता बनर्जी की नहीं है, बल्कि हर राजनीतिक पार्टी और हर उस मतदाता की लड़ाई है जो स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव चाहता है। उन्होंने राजनीतिक दलों को तोड़े जाने और चुनाव चिन्ह छीने जाने की एक ऐसी प्रक्रिया की ओर भी इशारा किया, जिसे वे पहले अन्य दलों के साथ होते हुए देख चुके हैं। कांग्रेस के कई नेताओं ने भी इसी तरह की प्रतिक्रिया दी।

इसके बाद कॉकroach जनता पार्टी यानी CJP की तरफ से भी प्रतिक्रिया आई। यह युवा और व्यंग्यात्मक राजनीतिक संगठन पिछले कुछ समय से ऑनलाइन और सड़कों पर अपनी मौजूदगी दर्ज करा रहा है। उसके सह-संयोजक सौरव दास ने चुनाव आयोग को सरकार का कठपुतली बताया और कहा कि जवाबदेही का समय आने वाला है। CJP के आधिकारिक हैंडल ने भी उनका समर्थन किया।

ममता बनर्जी पहले भी इस संगठन के प्रति गर्मजोशी दिखा चुकी हैं और अब इस पूरे घटनाक्रम में CJP की तरफ से उनके लिए सहानुभूति दिखाई गई है। ऐसे समय में, जब विपक्षी दल एक-दूसरे के साथ नए स्तर पर संपर्क और साझा जमीन तलाश रहे हैं, इस तरह के समर्थन अपने आप में महत्वपूर्ण हो जाते हैं।

उपचुनाव की तस्वीर भी इसी दौरान और उलझ गई। नंदीग्राम से ममता गुट की उम्मीदवार संचिता प्रधान डे ने अपना नामांकन वापस ले लिया। इसके बाद उनके गुट का नंदीग्राम में कोई उम्मीदवार मैदान में नहीं रहा। इसके बाद ममता बनर्जी ने कांग्रेस उम्मीदवार को समर्थन देने का ऐलान किया। उन्होंने इसे देश और INDIA गठबंधन के व्यापक हित में लिया गया फैसला बताया।

ममता बनर्जी ने कांग्रेस को अपना स्वाभाविक सहयोगी भी बताया। इन शब्दों का अपना राजनीतिक इतिहास है, क्योंकि वह खुद कभी कांग्रेस से अलग होकर तृणमूल कांग्रेस बनाने वाली नेता रही हैं। रेजीनगर को लेकर उन्होंने कहा कि इस पर फैसला बाद में लिया जाएगा।

नंदीग्राम कोई सामान्य विधानसभा सीट नहीं है। यही वह जगह है जिसने कभी वाम मोर्चे के खिलाफ ममता बनर्जी की राजनीतिक लड़ाई को नई ताकत दी थी। अब एक बार फिर यही सीट उनके लिए चुनौती बनकर सामने है, और सुवेंदु अधिकारी की राजनीतिक छाया अभी भी यहां काफी बड़ी है।

यह पूरा घटनाक्रम अचानक सामने नहीं आया। 2026 के विधानसभा चुनावों में तृणमूल कांग्रेस की बड़ी हार के बाद पार्टी के भीतर विभाजन की स्थिति बनी। बड़ी संख्या में विधायक रितब्रत गुट की ओर चले गए। संगठनात्मक चुनाव, बहुमत के दावे और पार्टी के संस्थापक के प्रति वफादारी को लेकर दोनों पक्षों के दावे—इन सबको चुनाव आयोग के सामने रखा गया। चुनाव चिन्ह आदेश के तहत चल रही इसी प्रक्रिया के बीच फिलहाल मूल नाम और चुनाव चिन्ह को फ्रीज किया गया है।

फिलहाल दोनों गुटों को पश्चिम बंगाल, मेघालय और त्रिपुरा में राजनीतिक दलों के रूप में मान्यता मिली हुई है। लेकिन असली लड़ाई अभी भी उसी चीज को लेकर है—मूल “ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस” नाम और घास तथा दो फूल वाला चुनाव चिन्ह किसके पास रहेगा। ममता बनर्जी के गुट ने इस मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट का रुख भी किया है।

जमीन पर इसका असर क्या होगा? उन सामान्य कार्यकर्ताओं और मतदाताओं के लिए, जिन्होंने वर्षों से तृणमूल कांग्रेस का दो फूल वाला झंडा देखा और उसके साथ अपनी राजनीतिक पहचान जोड़ी है, यह बदलाव निश्चित तौर पर भ्रम पैदा करने वाला है। चुनाव प्रचार की सामग्री, दीवारों पर लिखे जाने वाले संदेश और “मां, माटी, मानुष” से जुड़ी भावनात्मक पहचान—इन सभी चीजों को अचानक नए तरीके से देखना पड़ रहा है।

अब इन दोनों सीटों पर फुटबॉल खिलाड़ी और लिफाफा चुनाव चिन्ह को अपनी पहचान बनानी होगी। नंदीग्राम और रेजीनगर में इन नए चिन्हों का कितना असर होगा, इसका जवाब 6 अक्टूबर को आने वाले नतीजे ही देंगे।

ममता बनर्जी इससे पहले भी कई बड़े राजनीतिक संघर्षों से गुजर चुकी हैं। उन्होंने वाम मोर्चे के खिलाफ लड़ाई लड़ी है, केंद्र सरकारों से टकराव किया है और कई राजनीतिक झटकों के बाद वापसी की है। अब वह फिर से मजबूत होकर लौटने और अलग-अलग जिलों का दौरा जारी रखने की बात कर रही हैं।

वहीं बागी गुट का कहना है कि उन्होंने चुनाव चिन्ह को अपमान से बचाया है और अंततः वही मूल चिन्ह अपने पास रखेंगे। कांग्रेस सार्वजनिक रूप से ममता के समर्थन में आवाज उठा रही है और दोनों के बीच नए राजनीतिक समीकरण की संभावनाएं भी चर्चा में हैं। दूसरी ओर, CJP अपनी तरफ से तीखी आवाज के साथ इस पूरे घटनाक्रम पर प्रतिक्रिया दे रहा है।

आखिरकार, यह मामला केवल एक उपचुनाव का नहीं है। यह उस स्थिति के बारे में भी है, जब लगभग एक व्यक्ति की पहचान बन चुकी राजनीतिक पार्टी अंदरूनी दबाव और विभाजन के कारण टूटने लगती है। चुनाव आयोग ने फिलहाल एक अस्थायी रेखा खींच दी है। अदालतें इस मामले पर दलीलें सुनेंगी और मतदाता अपना फैसला देंगे।

फिलहाल ममता बनर्जी उस नाम और चुनाव चिन्ह के बिना खड़ी हैं, जिसे उन्होंने 28 वर्षों तक अपने राजनीतिक सफर के साथ जोड़े रखा। लेकिन वह अकेली नहीं हैं। कांग्रेस ने उनके समर्थन में आवाज उठाई है। CJP ने उनके प्रति सहानुभूति जताई है। और ममता खुद अगले राजनीतिक संघर्ष की बात कर रही हैं।

कोलकाता से आज की तस्वीर फिलहाल यही है। बंगाल की राजनीति शायद ही कभी आसान रही है। लेकिन इस हफ्ते एक बार फिर यह जरूर दिखा दिया कि राजनीति में जमीन कितनी तेजी से बदल सकती है।

स्रोत: द हिंदू, इंडिया टुडे, मिंट, टेलीग्राफ इंडिया, टाइम्स ऑफ इंडिया, NDTV, इकोनॉमिक टाइम्स और द वीक की 17–19 सितंबर 2026 की रिपोर्ट्स।

@रोहित मनराल

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