
विदेश मंत्री एस. जयशंकर इस सप्ताह न्यूयॉर्क में होने वाली एक नए समूह ‘पार्टनर्स फॉर मल्टीलेटरलिज्म’ की पहली बैठक में शामिल होने जा रहे हैं। लोग इसे पहले से ही संक्षेप में P4M कह रहे हैं। यह बैठक संयुक्त राष्ट्र महासभा (UN General Assembly) की बड़ी बैठक के साथ हो रही है। मूल रूप से भारत ऐसे प्रयास का हिस्सा बन रहा है, जिसका मकसद बहुपक्षवाद (Multilateralism) को बनाए रखना है, बिना हर मुद्दे को बड़ी शक्तियों के बीच टकराव में बदलने के।
इस समूह की शुरुआत यूरोपीय संघ, ब्राजील, केन्या और कनाडा ने की है। इन चारों के नेताओं — यूरोपीय परिषद के अध्यक्ष एंटोनियो कोस्टा, ब्राजील के राष्ट्रपति लुइज इनासियो लूला दा सिल्वा, केन्या के राष्ट्रपति विलियम रूटो और कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी — ने Financial Times में एक संयुक्त लेख लिखा। उन्होंने कहा कि यह कोई नया बंद क्लब या कोई भारी-भरकम संगठन बनाने की कोशिश नहीं है। विचार एक ऐसे लचीले और खुले मंच का है, जहां अलग-अलग क्षेत्रों और अलग-अलग राजनीतिक पृष्ठभूमि वाले देश एक साथ बैठ सकें, जरूरत के हिसाब से गठबंधन बना सकें और वास्तविक सुधारों को आगे बढ़ाने की कोशिश कर सकें।
इस समूह का उद्देश्य संयुक्त राष्ट्र और अन्य बहुपक्षीय संस्थाओं को अधिक प्रतिनिधित्व वाला, अधिक वैध, अधिक प्रभावी और अधिक भरोसेमंद बनाने में मदद करना है। इसके एजेंडे में कई व्यापक मुद्दे शामिल हैं — क्षेत्रीय संगठनों के बीच बेहतर तालमेल, शांति और सुरक्षा, वैश्विक अर्थव्यवस्था के संचालन का तरीका और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, जलवायु परिवर्तन, स्वास्थ्य सुरक्षा तथा डिजिटल बदलाव जैसी नई चुनौतियों से निपटने के लिए साझा तरीके।
संस्थापकों ने इस बात पर जोर दिया है कि इसका उद्देश्य मौजूदा व्यवस्था को खत्म करना नहीं, बल्कि उसे सुधारना और मजबूत करना है। इसके लिए वे संयुक्त राष्ट्र चार्टर के मूल सिद्धांतों — संप्रभु समानता, क्षेत्रीय अखंडता, विवादों का शांतिपूर्ण समाधान, बल के इस्तेमाल या उसकी धमकी से बचना, मानवीय कानून, सतत विकास, मानवाधिकार और मौलिक स्वतंत्रताओं — को आधार मानना चाहते हैं।
इस समूह के गठन का समय भी महत्वपूर्ण है। संस्थापकों ने कहा कि दुनिया पहले से कहीं ज्यादा एक-दूसरे से जुड़ी हुई है, लेकिन साथ ही पहले से ज्यादा बंटी हुई भी नजर आ रही है। 2025 में 1946 के बाद राज्य-आधारित सशस्त्र संघर्षों की सबसे ज्यादा संख्या दर्ज की गई, जिसमें 35 देशों में लड़ाई हुई। वहीं सैन्य खर्च बढ़कर करीब 2.9 ट्रिलियन डॉलर के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया।
ऐसे माहौल में उन्होंने कहा कि एक साथ काम करना कोई सिर्फ आदर्शवादी विचार नहीं है, बल्कि जरूरत है। कोई भी देश, चाहे वह कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, जलवायु जोखिम, महामारी, वित्तीय झटकों, सप्लाई-चेन की समस्याओं या AI की तेज रफ्तार से अकेले नहीं निपट सकता।
उन्होंने संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस की उन बातों का भी हवाला दिया, जिनमें उन्होंने कहा है कि बड़ी शक्तियां अपनी क्षमताओं की सीमाओं तक पहुंच रही हैं और बाकी दुनिया को यह याद रखने की जरूरत है कि सामूहिक कार्रवाई अब भी क्या हासिल कर सकती है। P4M को इसी स्थिति और इस तथ्य के जवाब के तौर पर पेश किया जा रहा है कि मौजूदा संस्थाएं बार-बार सामने आने वाले संकटों से निपटने में संघर्ष कर रही हैं।
भारतीय अधिकारियों ने पुष्टि की है कि एस. जयशंकर इस बैठक में शामिल होंगे। वह पूरे UNGA सप्ताह के लिए भारतीय प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व कर रहे हैं और 26 सितंबर को संयुक्त राष्ट्र महासभा में भारत का संबोधन देने वाले हैं।
P4M का सत्र 21 सितंबर को न्यूयॉर्क के समय के अनुसार शाम 6:30 बजे निर्धारित है, जो भारत में 22 सितंबर की सुबह होगी। इसके बाद एक प्रेस कॉन्फ्रेंस होने की भी उम्मीद है। अभी यह स्पष्ट नहीं है कि भारत को संस्थापक देशों के संयुक्त संदेश में शामिल होने के लिए कहा गया था या नहीं, लेकिन नई दिल्ली की इस बैठक में मौजूदगी इस पहल में उसकी दिलचस्पी को जरूर दिखाती है।
भारत पहले से ही ऐसे कई समूहों का हिस्सा है जो इसी तरह के मुद्दों पर चर्चा करते हैं — गुटनिरपेक्ष आंदोलन (NAM), BRICS, G20 और G4, जो संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद को अधिक प्रतिनिधित्व वाला बनाने और उसके विस्तार की मांग करता रहा है।
भारत के लिए P4M में शामिल होना उस लंबे समय से चले आ रहे तर्क के अनुरूप है कि अगर बहुपक्षवाद को उपयोगी बनाए रखना है, तो उसमें सुधार जरूरी है। संस्थाओं को आज की दुनिया की वास्तविकता के ज्यादा करीब होना चाहिए, Global South को उचित आवाज मिलनी चाहिए और उन्हें लगातार सामने आ रही नई समस्याओं के लिए तैयार रहना चाहिए।
यह समूह उन मध्यम शक्तियों और दूसरे देशों के लिए जगह बनाने की कोशिश कर रहा है, जो खुद को सुपरपावर प्रतिद्वंद्विता के बीच फंसा हुआ नहीं देखना चाहते। मार्क कार्नी ने इस साल की शुरुआत में दावोस में भी इसी तरह की बात की थी कि जब पुरानी वैश्विक व्यवस्था कमजोर होती महसूस हो रही हो, तब मध्यम शक्तियों को एक साथ काम करने के रास्ते खोजने की जरूरत है।
P4M इसी विचार को वास्तविक रूप देने की एक कोशिश नजर आता है। इसमें यूरोप, लैटिन अमेरिका, अफ्रीका और उत्तरी अमेरिका की आवाजों को एक ऐसे ढांचे में साथ लाने की कोशिश की जा रही है, जो सभी देशों को किसी कठोर संरचना में बांधने के बजाय लचीला रहे।
हालांकि, यह समूह आगे चलकर एक स्थायी मंच बनता है या मुख्य रूप से बातचीत तक सीमित रहता है, यह कई बातों पर निर्भर करेगा। इसमें कितने देश वास्तव में शामिल होते हैं, इसका काम करने का तरीका कितना स्पष्ट और उपयोगी बनता है और क्या यह उन सुधारों के मुद्दों पर आगे बढ़ पाता है जो वर्षों से अटके हुए हैं।
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का विस्तार इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। इस मुद्दे पर दशकों से चर्चा होती रही है, लेकिन अब तक बहुत कम ठोस बदलाव देखने को मिला है। इसी तरह AI के नियम, जलवायु वित्त और महामारी से निपटने की तैयारी जैसे मुद्दों के लिए लगातार काम और संसाधनों की जरूरत है, सिर्फ एक और बैठक की नहीं।
भारत के लिए पहली बैठक में शामिल होना एक ऐसा रास्ता है, जिसके जरिए वह बिना किसी नई प्रतिबद्धता में बंधे व्यापक स्तर पर नए साझेदारों के साथ बातचीत कर सकता है। इससे नई दिल्ली यह रुख भी दोहराती रह सकती है कि वह संयुक्त राष्ट्र पर केंद्रित नियम-आधारित वैश्विक व्यवस्था का समर्थन करती है, साथ ही उन मंचों के जरिए भी काम करती रहती है जिनका वह पहले से हिस्सा है।
ऐसे समय में जब बड़ी शक्तियों के बीच प्रतिस्पर्धा लगातार तेज नजर आ रही है और वैश्विक संस्थाएं दबाव में हैं, एक और कूटनीतिक पहल शायद परिचित लग सकती है। लेकिन इसके संस्थापक लगातार यह कहते रहे हैं कि उनका उद्देश्य खुले दरवाजे बनाए रखना, किसी विशेष या बंद क्लब से बचना और उन सिद्धांतों के आधार पर व्यावहारिक गठबंधन तैयार करना है, जिन्हें ज्यादातर देश पहले से स्वीकार करते हैं।
न्यूयॉर्क में UNGA का हाई-लेवल सप्ताह आगे बढ़ने के साथ P4M की बैठक कई अन्य साइड इवेंट्स के बीच ध्यान आकर्षित करने की कोशिश करेगी। जयशंकर की मौजूदगी का मतलब है कि शुरुआत से ही इस बातचीत में भारत की आवाज मौजूद रहेगी।
यह पहल पहली बैठक के बाद कितनी आगे बढ़ती है और क्या यह लंबे समय से अटके सुधारों की बहस को वास्तव में आगे बढ़ा पाती है, यह अभी खुला सवाल है। फिलहाल यह इस बात की याद दिलाती है कि कई सरकारें अब भी मानती हैं कि एक साथ काम करने की कोशिश जरूरी है, भले ही मौजूदा भू-राजनीतिक माहौल कितना भी चुनौतीपूर्ण क्यों न हो।
स्रोत:
- The Hindu, “‘Partners for Multilateralism’: India to attend new non-superpower grouping’s inaugural session at UN,” 21 सितंबर 2026।
- Financial Times, “Multilateralism is not idealism, it is a necessity,” लुइज इनासियो लूला दा सिल्वा, एंटोनियो कोस्टा, विलियम रूटो और मार्क कार्नी का संयुक्त लेख, 20 सितंबर 2026।
- P4M के लॉन्च और संयुक्त राष्ट्र महासभा सप्ताह से जुड़ी Bloomberg, The Globe and Mail और अन्य रिपोर्टों से अतिरिक्त जानकारी।
@रोहित मनराल