प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एक बार फिर सुर्खियों में हैं, लेकिन इस बार वजह कोई बड़ी नीति, रक्षा समझौता या कूटनीतिक उपलब्धि नहीं, बल्कि मीडिया से उनका संवाद करने का तरीका है—या यूँ कहें कि उसका अभाव। ऑस्ट्रेलिया के एक पत्रकार की टिप्पणी ने सोशल मीडिया पर नई बहस छेड़ दी है और यह मामला नॉर्वे में हुए हालिया विवाद के कुछ ही दिनों बाद सामने आया है।
प्रधानमंत्री मोदी इन दिनों मेलबर्न, ऑस्ट्रेलिया के दौरे पर हैं। वह व्यापार, रक्षा और दोनों लोकतांत्रिक देशों के बीच सहयोग जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर बातचीत कर रहे हैं। लेकिन एक बार फिर कोई खुली प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित नहीं की गई, जहाँ पत्रकार सीधे उनसे सवाल पूछ सकें। इसी दौरान ऑस्ट्रेलिया के 7News के पत्रकार ब्लेक जॉनसन ने कैमरे के सामने कहा, “प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मेलबर्न दौरे के दौरान शायद आप उनसे इससे ज़्यादा करीब नहीं पहुँच सकते। वह बिना स्क्रिप्ट वाली प्रेस कॉन्फ्रेंस से बचने के लिए जाने जाते हैं और अधिक नियंत्रित सार्वजनिक कार्यक्रमों को प्राथमिकता देते हैं।”
यह टिप्पणी सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो गई। भारत में कई लोगों ने इसे सही बताया, जबकि बड़ी संख्या में लोगों ने पत्रकार की टिप्पणी का विरोध भी किया।
साल 2014 में प्रधानमंत्री बनने के बाद से नरेंद्र मोदी ने भारत में अब तक एक भी स्वतंत्र प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं की है। हालांकि, कुछ मौकों पर विदेश यात्राओं के दौरान संयुक्त प्रेस कार्यक्रमों में वह शामिल हुए हैं, लेकिन पत्रकारों के सवालों के लिए अलग से कोई प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं की।
प्रधानमंत्री मोदी के समर्थकों का कहना है कि वह संसद, ‘मन की बात’, विशाल जनसभाओं और डिजिटल माध्यमों के जरिए सीधे जनता से संवाद करते हैं। उनका मानना है कि आज के समय में कई प्रेस कॉन्फ्रेंस वास्तविक चर्चा से अधिक राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप और सनसनी का मंच बन जाती हैं। स्वयं प्रधानमंत्री भी पहले मीडिया के एक वर्ग पर पक्षपातपूर्ण रिपोर्टिंग के आरोप लगा चुके हैं।
दूसरी ओर, आलोचकों का कहना है कि भारत जैसे बड़े और जीवंत लोकतंत्र में प्रधानमंत्री को समय-समय पर पत्रकारों के कठिन सवालों का सामना करना चाहिए। प्रेस की स्वतंत्रता, मानवाधिकार, सरकारी नीतियों और अन्य संवेदनशील मुद्दों पर सीधे जवाब देना लोकतांत्रिक जवाबदेही का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है। ऑस्ट्रेलिया में आई यह टिप्पणी इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि कुछ ही सप्ताह पहले नॉर्वे में भी ऐसा ही एक घटनाक्रम देखने को मिला था।
ओस्लो की घटना पर नज़र डालें तो प्रधानमंत्री मोदी नॉर्वे के प्रधानमंत्री जोनास गाहर स्टोरे के साथ संयुक्त बयान देने के बाद मंच से जा रहे थे। तभी Dagsavisen की पत्रकार हेले लिंग स्वेंडसन ने आवाज़ लगाकर पूछा, “प्रधानमंत्री मोदी, आप दुनिया की सबसे स्वतंत्र प्रेस के सवालों का जवाब क्यों नहीं देते?” प्रधानमंत्री मोदी बिना कोई प्रतिक्रिया दिए आगे बढ़ गए। इसके बाद नॉर्वे के प्रधानमंत्री पत्रकारों से बातचीत करने के लिए वापस लौटे। यह वीडियो भी सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुआ।
इस घटना के बाद पत्रकार को सोशल मीडिया पर भारी ट्रोलिंग का सामना करना पड़ा। रिपोर्ट्स के अनुसार, कुछ समय के लिए उनके Meta प्लेटफॉर्म से जुड़े सोशल मीडिया अकाउंट भी निलंबित हो गए, जिससे विवाद और बढ़ गया।
यह पहली बार नहीं है जब प्रधानमंत्री मोदी और मीडिया के संबंधों को लेकर चर्चा हुई हो। वह सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X (पूर्व में ट्विटर) पर लगातार सक्रिय रहते हैं, बड़े सार्वजनिक कार्यक्रमों को संबोधित करते हैं और नियंत्रित इंटरव्यू या आधिकारिक आयोजनों में भाग लेते हैं। उनकी टीम का तर्क है कि आज के दौर में पारंपरिक प्रेस कॉन्फ्रेंस अक्सर वास्तविक संवाद के बजाय राजनीतिक टकराव का माध्यम बन जाती हैं। उनका मानना है कि प्रधानमंत्री सीधे जनता तक पहुँचकर अपनी बात अधिक प्रभावी ढंग से रखते हैं।

वहीं, आलोचकों का कहना है कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में प्रेस के सवालों से बचना उचित संदेश नहीं देता। कांग्रेस, आम आदमी पार्टी सहित विपक्षी दल कई बार इस मुद्दे को उठाते रहे हैं और इसे लोकतांत्रिक परंपराओं के विपरीत बताते हैं। दूसरी ओर, प्रधानमंत्री मोदी के समर्थकों का कहना है कि दुनिया के कई अन्य नेता भी चुनिंदा मीडिया संवाद करते हैं और केवल मोदी को निशाना बनाना उचित नहीं है।
प्रेस स्वतंत्रता के लिए प्रसिद्ध नॉर्वे और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में उठे ये सवाल इस बहस को और गहरा कर रहे हैं। सोशल मीडिया ने इन घटनाओं को और तेजी से फैलाया है, जहाँ छोटे वीडियो क्लिप, अधूरी जानकारी और अलग-अलग विचारधाराएँ तुरंत व्यापक बहस का रूप ले लेती हैं। प्रधानमंत्री मोदी के समर्थक इसे चयनात्मक आलोचना बताते हैं, जबकि आलोचक इसे पारदर्शिता से जुड़े बड़े सवाल के रूप में देखते हैं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कार्यशैली हमेशा से निर्णायक नेतृत्व, बड़े विज़न, ‘विकसित भारत’ जैसे लक्ष्यों और जनता से सीधे संवाद पर आधारित रही है। लेकिन क्या आधुनिक लोकतंत्र में केवल यही पर्याप्त है, या फिर स्वतंत्र प्रेस के सवालों का सामना करना भी उतना ही आवश्यक है? ऑस्ट्रेलिया और नॉर्वे की ये दोनों घटनाएँ इसी व्यापक बहस को फिर से सामने लेकर आई हैं।
मजबूत नेतृत्व का अर्थ केवल बड़े फैसले लेना नहीं, बल्कि कठिन सवालों का सामना करके जनता का भरोसा और मजबूत करना भी माना जाता है। वहीं, कुछ लोगों का यह भी मानना है कि पारंपरिक प्रेस कॉन्फ्रेंस का स्वरूप अब बदल रहा है और जवाबदेही सुनिश्चित करने के नए तरीकों पर भी विचार करने की आवश्यकता है।
स्रोत:
ऑस्ट्रेलिया में पत्रकार की टिप्पणी और उसके संदर्भ पर हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट।
नॉर्वे की घटना पर बीबीसी, अल जज़ीरा और अन्य अंतरराष्ट्रीय मीडिया संस्थानों की रिपोर्ट।
पत्रकारों और राजनीतिक दलों द्वारा साझा किए गए सोशल मीडिया वीडियो और वायरल क्लिप।
द वायर, रॉयटर्स और अन्य मीडिया संस्थानों के विश्लेषण एवं रिपोर्ट।