ट्रंप ने रूस पर कड़े प्रतिबंधों को लगाया विराम, भारत को 100% टैरिफ के खतरे से मिली राहत

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वॉशिंगटन से आई ताजा खबर ने भारत में कई लोगों को इस सप्ताहांत राहत की सांस लेने का मौका दिया है। शुक्रवार रात राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक कार्यकारी आदेश पर हस्ताक्षर किए, जिसके तहत रूस के तेल और गैस से जुड़े कई नए प्रतिबंधों और टैरिफ उपायों पर फिलहाल रोक लगा दी गई है। ये उपाय उस कानून के तहत लागू होने वाले थे, जिस पर उन्होंने लगभग एक महीने पहले हस्ताक्षर किए थे। इनसे भारत जैसे देशों के अमेरिका को निर्यात होने वाले सामान पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाया जा सकता था। हालांकि, ट्रंप ने इन्हें फिलहाल छूट देते हुए कहा कि यह फैसला अमेरिका के राष्ट्रीय हित में है।

इस कानून का नाम लिंडसे ओ. ग्राहम सैंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट ऑफ 2026 है। इसका नाम दक्षिण कैरोलिना के दिवंगत सीनेटर के नाम पर रखा गया, जो रूस के खिलाफ कड़े रुख के समर्थक थे। इस कानून को अमेरिकी कांग्रेस में व्यापक द्विदलीय समर्थन के साथ पारित किया गया था। ट्रंप ने सितंबर के मध्य में इस पर हस्ताक्षर किए थे। इसका उद्देश्य रूस के ऊर्जा राजस्व पर दबाव डालना था, जिससे यूक्रेन में जारी युद्ध को आर्थिक मदद मिलती है। कानून में रूस की तेल और गैस बिक्री, टैंकरों के तथाकथित ‘शैडो फ्लीट’ और रूसी तेल के सबसे बड़े खरीदारों को भी निशाना बनाया गया था।

इन नियमों के तहत, रूस के कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस के पांच सबसे बड़े आयातकों पर अमेरिका को निर्यात किए जाने वाले उनके सभी सामानों पर अतिरिक्त 100 प्रतिशत शुल्क लगाया जा सकता था, यदि वे 18 अक्टूबर के बाद भी रूस से नई ऊर्जा आपूर्ति खरीदना जारी रखते। रूस पर मौजूदा प्रतिबंधों से बचने में मदद करने वाले शीर्ष पांच देशों पर भी इसी तरह के उपाय लागू हो सकते थे। वहीं, रूस से सीधे आने वाले सामान पर 500 प्रतिशत तक टैरिफ लगाया जा सकता था। रविवार की समयसीमा नजदीक आ रही थी और भारत इस खतरे के दायरे में था, क्योंकि वह रियायती दरों पर रूसी कच्चे तेल के सबसे बड़े खरीदारों में से एक है।

भारत अपनी जरूरत का 88 प्रतिशत से अधिक तेल आयात करता है और हाल के महीनों में रूसी तेल उसकी कुल तेल आपूर्ति का एक बड़ा हिस्सा रहा है। कुछ समय में रूसी तेल की हिस्सेदारी लगभग 45 प्रतिशत तक पहुंच गई थी, जबकि आयात की मात्रा प्रतिदिन करीब 20 लाख बैरल तक रही। इस सस्ते तेल ने घरेलू स्तर पर ईंधन की कीमतों को नियंत्रित रखने और भारत के रिफाइनिंग उद्योग को समर्थन देने में मदद की है। यदि भारतीय निर्यात पर अचानक 100 प्रतिशत अमेरिकी टैरिफ लगा दिया जाता, तो इससे निर्माताओं, निर्यातकों और दोनों देशों के व्यापारिक संबंधों को बड़ा झटका लग सकता था।

ट्रंप के कार्यकारी आदेश में कानून को औपचारिक रूप से लागू किया गया, लेकिन इसके बाद प्रमुख टैरिफ प्रावधानों को तत्काल निलंबित कर दिया गया। उन्होंने आदेश में संबंधित धाराओं के तहत निर्धारित शुल्कों से छूट देने की बात कही और कांग्रेस को प्रमाणित किया कि यह अस्थायी रोक अमेरिका के राष्ट्रीय हितों की पूर्ति करती है। यह छूट स्थायी नहीं है। यदि प्रशासन को लगता है कि आगे और कार्रवाई की जरूरत है, तो वह इन उपायों को दोबारा लागू कर सकता है। अधिकारियों को रूसी तेल की खरीद और प्रतिबंधों से बचने की गतिविधियों पर नजर बनाए रखने का निर्देश भी दिया गया है।

यह फैसला अचानक नहीं आया। इससे एक सप्ताह पहले ही ट्रंप ने रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ रूस से डीजल की आपूर्ति को लेकर एक समझौते की घोषणा की थी। इसका उद्देश्य वैश्विक ऊर्जा कीमतों को कम करने में मदद करना था। पहली खेप 3 लाख टन से अधिक होने की बात कही गई थी, जिसके बाद और आपूर्ति की योजना थी। ट्रंप ऊर्जा बाजारों पर दबाव कम करने की बात करते रहे हैं और कई मौकों पर यूक्रेनी नेतृत्व की आलोचना भी कर चुके हैं। इस फैसले का समय अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो की भारत यात्रा से भी मेल खाता है। ऐसे में इस कदम ने दोनों देशों के बीच होने वाली बातचीत से पहले तनाव के एक संभावित मुद्दे को फिलहाल दूर कर दिया है।

भारत के लिए यह अस्थायी राहत का स्वागत योग्य कदम है। नई दिल्ली लंबे समय से कहती रही है कि उसकी ऊर्जा सुरक्षा सर्वोपरि है और वह रूसी तेल व्यावसायिक शर्तों पर खरीदता है, क्योंकि रियायती कीमतें देश की जरूरतों के लिहाज से फायदेमंद हैं। ग्राहम कानून पारित होने के बाद भारतीय अधिकारियों ने भी इस पर चिंता जताई थी। इस साल की शुरुआत में दोनों देशों ने टैरिफ से जुड़े कुछ मुद्दों को सुलझाया था। रूसी तेल खरीदने से संबंधित अतिरिक्त 25 प्रतिशत शुल्क फरवरी में व्यापक व्यापारिक ढांचे के तहत हटा दिया गया था। इस व्यवस्था के तहत भारतीय सामान पर पारस्परिक टैरिफ भी घटाकर 18 प्रतिशत किया गया था। दोनों देशों के बीच बड़े व्यापार समझौते पर बातचीत अभी जारी है।

इस निलंबन का मतलब है कि भारतीय निर्यातकों को तत्काल भारी शुल्क वृद्धि का सामना नहीं करना पड़ेगा, जिससे अमेरिकी बाजार में उनके उत्पाद काफी महंगे हो सकते थे। इससे भारत को अपने मौजूदा तेल आयात के मिश्रण को बनाए रखने में भी मदद मिलेगी, क्योंकि अब हर नई खेप के साथ द्वितीयक प्रतिबंधों का तत्काल खतरा नहीं रहेगा। हालांकि, निगरानी जारी रहेगी और संबंधित कानूनी ढांचा भी बना रहेगा। इसलिए दबाव पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। चीन और कुछ अन्य देश भी इसी तरह की स्थिति में हैं।

आलोचकों का कहना है कि इस तरह की छूट रूस के ऊर्जा राजस्व को कम करने के मूल उद्देश्य को कमजोर कर सकती है। वहीं, इसके समर्थक वैश्विक ईंधन कीमतों को स्थिर रखने की जरूरत पर जोर देंगे, खासकर तब जब ऊर्जा बाजारों पर दूसरे दबाव भी मौजूद हैं और अमेरिका में मध्यावधि चुनावों से पहले घरेलू राजनीति महत्वपूर्ण हो रही है। दोनों पक्षों की दलीलों के बीच फिलहाल व्यावहारिक परिणाम यह है कि भारत पर मंडरा रहा 100 प्रतिशत टैरिफ का खतरा कुछ समय के लिए टाल दिया गया है।

ट्रंप ने भविष्य में अपना रुख बदलने का विकल्प खुला रखा है। आदेश में स्पष्ट किया गया है कि ये छूट तब तक प्रभावी रहेंगी, जब तक अधिकारी यह निर्णय नहीं लेते कि आगे और कार्रवाई जरूरी है। इसलिए यह कहानी अभी समाप्त नहीं हुई है, बल्कि फिलहाल एक विराम लगा है। अमेरिकी बाजार में बिक्री करने वाले भारतीय कारोबारियों और देश की ऊर्जा आपूर्ति का प्रबंधन करने वाले नीति-निर्माताओं के लिए यह राहत महत्वपूर्ण है। यह विराम कितने समय तक बना रहेगा, यह रूसी तेल की आपूर्ति, डीजल समझौतों और वॉशिंगटन तथा नई दिल्ली के बीच व्यापक बातचीत के अगले घटनाक्रम पर निर्भर करेगा।

स्रोत:

  • द इंडियन एक्सप्रेस
  • Scroll.in
  • बिजनेस टुडे
  • फाइनेंशियल एक्सप्रेस
  • टाइम्स ऑफ इंडिया
  • CBS News
  • द हंस इंडिया
  • व्हाइट हाउस के कार्यकारी आदेश से जुड़ी रिपोर्टें और विभिन्न मीडिया संस्थानों की खबरें (16–17 अक्टूबर, 2026)

@रोहित मनराल

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