
बस्तर या दंतेवाड़ा के जंगलों में लाल झंडे, घात लगाकर किए गए हमले, बारूदी सुरंगों के धमाके और पहाड़ियों की तरफ राइफलें लेकर गायब होते युवा पुरुष और महिलाएं। इसकी शुरुआत एक वास्तविक जगह और जमीन को लेकर वास्तविक संघर्ष से हुई थी।
मई 1967। पश्चिम बंगाल में हिमालय की तलहटी में बसा एक छोटा सा गांव — नक्सलबाड़ी। किसान, जिनमें ज्यादातर आदिवासी और भूमिहीन मजदूर थे, जमींदारों के खिलाफ उठ खड़े हुए। वे उस जमीन पर अपना अधिकार चाहते थे, जिसे वे खुद जोतते थे। चारु मजूमदार, कानू सान्याल, जंगल संथाल — ये वे नाम थे जो इस आंदोलन से सामने आए। माओ से प्रेरित होकर उनका मानना था कि केवल सशस्त्र संघर्ष ही बदलाव ला सकता है। पुलिस ने गोली चलाई, लोग मारे गए और यह विचार आग की तरह फैल गया।
कुछ ही वर्षों के भीतर CPI(ML) का जन्म हुआ। कलकत्ता के कॉलेजों के छात्र अपनी किताबें छोड़कर इस आंदोलन में शामिल होने लगे। “वर्ग विनाश” यानी “Class Annihilation” इसका नारा बन गया। जमींदारों और पुलिसकर्मियों की हत्या होने लगी। यह आंदोलन क्रूर भी था, आदर्शवादी भी और अपने शुरुआती रूप में अल्पकालिक भी। 1972 तक इसके शुरुआती ज्यादातर नेता या तो मारे जा चुके थे या जेल में थे।
लेकिन विचार खत्म नहीं हुआ। वह आगे बढ़ गया। 1980 के दशक में इसने आंध्र प्रदेश, बिहार, ओडिशा और बाद में छत्तीसगढ़ तथा झारखंड बनने वाले इलाकों के आदिवासियों के बीच अपनी जड़ें जमाईं। दक्षिण में पीपुल्स वॉर ग्रुप और पूर्व में माओवादी कम्युनिस्ट सेंटर सक्रिय थे। 2004 में दोनों का विलय हुआ और CPI (Maoist) का गठन हुआ।
यह उसका चरम दौर था। एक समय करीब 180 जिले इसके प्रभाव की चपेट में महसूस करते थे। सुरक्षा बलों के सैकड़ों जवान मारे गए। आम नागरिक भी दोनों तरफ के संघर्ष के बीच फंस गए। खनन कंपनियां, ठेकेदार, स्थानीय नेता — हर किसी की अपनी कहानी थी। मनमोहन सिंह ने इसे देश के सामने मौजूद सबसे बड़ी आंतरिक सुरक्षा चुनौती बताया था। “रेड कॉरिडोर” एक वास्तविकता था।
अब वर्तमान में आते हैं। बंदूकें काफी हद तक शांत हो चुकी हैं। आधिकारिक आंकड़े बताते हैं कि हिंसा अपने चरम वर्षों की तुलना में लगभग 90 प्रतिशत तक कम हो गई है। प्रभावित जिलों की संख्या 100 से ज्यादा से घटकर अब कुछ जिलों तक सीमित रह गई है। हजारों कैडरों ने आत्मसमर्पण किया है। बड़े नेता ज्यादातर खत्म हो चुके हैं — कोई मारा गया, कोई पकड़ा गया और कुछ उम्रदराज हो चुके हैं। सरकार का कहना है कि सशस्त्र चरण अब अपनी अंतिम सांसें गिन रहा है। गृह मंत्रालय के आंकड़े और छत्तीसगढ़ तथा झारखंड से सामने आने वाली जमीनी रिपोर्टें भी इस दावे का समर्थन करती हैं।
तो अब वामपंथ आगे कहां जाएगा? पिछले कुछ वर्षों की असली कहानी यही है। सशस्त्र विंग कमजोर हो चुका है, लेकिन विचार कभी केवल जंगलों तक सीमित नहीं रहे। शुरुआत से ही इसका एक शहरी पक्ष भी था — छात्र, प्रोफेसर, वकील, लेखक और कार्यकर्ता, जो नक्सलियों को दबे-कुचले लोगों के लिए लड़ने वाले योद्धा मानते थे। कुछ ने खुले तौर पर समर्थन किया, कुछ ने चुपचाप सहानुभूति दिखाई और कुछ ने उन्हें आतंकवादी कहने से इनकार किया।
2010 के दशक में “अर्बन नक्सल” शब्द का इस्तेमाल शुरू हुआ। भीमा कोरेगांव मामले में गिरफ्तारियों के बाद यह शब्द आम हो गया। अब भाषा एक बार फिर बदल गई है।
2026 के स्वतंत्रता दिवस भाषण में प्रधानमंत्री ने “दिमागी नक्सल” शब्द का इस्तेमाल किया — यानी दिमाग में मौजूद नक्सलवाद। उन्होंने कहा कि जंगलों में मौजूद सशस्त्र नक्सलियों से काफी हद तक निपटा जा चुका है, लेकिन शहरों और संस्थानों में उसी सोच को लेकर चलने वाले लोग अभी भी मौके तलाश रहे हैं। उन्हें पहचानना, अलग-थलग करना और युवाओं को मुख्यधारा में लाना — यही संदेश था।
इस पर तत्काल प्रतिक्रिया भी हुई। कुछ विपक्षी नेताओं ने कहा कि यह शब्द किसी भी आलोचक को निशाना बनाने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। पी. चिदंबरम ने तो यहां तक कहा कि उन्हें ऐसा व्यक्ति कहलाने पर गर्व है। सोशल मीडिया पर खुद को “दिमागी नक्सल पार्टी” बताने वाले अकाउंट सामने आए, जहां सोचने और विरोध करने से जुड़े मीम और नारे पोस्ट किए गए।
दूसरी तरफ, सरकार के समर्थकों का तर्क है कि वर्षों तक एक पूरा इकोसिस्टम — विश्वविद्यालयों, NGOs, मीडिया के कुछ हिस्सों और कानूनी क्षेत्र में — माओवादी प्रोजेक्ट के साथ नरम रवैया अपनाता रहा, जबकि इसकी कीमत सुरक्षा बलों को चुकानी पड़ी। वे पुराने पार्टी दस्तावेजों की ओर इशारा करते हैं, जिनमें शहरों में बुद्धिजीवियों और जन संगठनों के इस्तेमाल को बड़े रणनीतिक लक्ष्य का हिस्सा बताया गया था।
यहीं भारतीय वामपंथ का विकास दिलचस्प हो जाता है। संसदीय वामपंथ — CPI और CPI(M) — कभी पश्चिम बंगाल में 34 साल तक सत्ता में रहा, त्रिपुरा में भी दशकों तक शासन किया और हाल तक केरल में सत्ता में रहा। उन्होंने लोकतांत्रिक रास्ता चुना। नक्सली धारा ने इस रास्ते को पूरी तरह खारिज कर दिया। एक पक्ष चुनाव लड़ता रहा और सरकारें चलाता रहा; दूसरा राज्य व्यवस्था को खत्म करने की कोशिश करता रहा।
समय के साथ दोनों कमजोर हुए हैं। मुख्यधारा का वामपंथ 1980 के दशक की तुलना में अब अपनी पुरानी ताकत की सिर्फ एक छाया रह गया है। सशस्त्र वामपंथ भी अपने अंतिम दौर में है। अब जो बचा है, वह विचारों को लेकर संघर्ष है — जमीन, जंगल, खनन, विकास, आदिवासियों की आवाज कौन उठाएगा और न्याय कैसा होना चाहिए, इसका फैसला कौन करेगा।
आज आप नक्सलबाड़ी से गुजरें तो वहां BJP के झंडे दिखाई दे सकते हैं। वहां के युवा क्रांति से ज्यादा नौकरी और सड़कों की बात करते हैं। पुराने रेड कॉरिडोर वाले जिलों में सुरक्षा कैंपों के साथ नई सड़कें, स्कूल और मोबाइल टावर भी पहुंचे हैं।
लेकिन क्या इससे जमीन और सम्मान से जुड़े पुराने घाव भर गए हैं? यह सवाल अभी भी खुला है। गरीबी और अलगाव अपने आप पैदा नहीं हुए थे। लेकिन उनका जवाब बंदूक के जरिए देने का तरीका साफ तौर पर विफल रहा है।
“दिमागी नक्सल” को लेकर चल रही बहस वास्तव में असहमति की सीमाओं को लेकर बहस है। राज्य की आलोचना करना उसके खिलाफ हिंसा को सही ठहराने जैसा नहीं है। किसी खनन परियोजना पर सवाल उठाना किसी जवान की हत्या को सही ठहराने जैसा नहीं है।
लेकिन लोकतंत्र में कड़ी आलोचना और वैचारिक समर्थन के बीच की रेखा धुंधली हो सकती है और दोनों पक्षों के पास उसे और धुंधला करने के अपने-अपने कारण हैं। एक पक्ष इसे एक ऐसे खतरे के रूप में देखता है, जिसे नाम देना जरूरी है। दूसरा पक्ष इसे एक ऐसे सुविधाजनक लेबल के रूप में देखता है, जिसे असहज करने वाली आवाजों को दबाने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है।
एक छोटे से बंगाली गांव में हुए उस पहले संघर्ष के करीब 60 साल बाद बंदूकें शांत हैं। लेकिन उन वर्षों का मतलब क्या था, इसे लेकर बहस पहले से कहीं ज्यादा तेज है।
यही बात, किसी भी अन्य चीज से ज्यादा, दिखाती है कि भारत में वामपंथ कैसे बदला है — खेतों और जंगलों से निकलकर अब शब्दों, संस्थानों और देश की कहानी को लेकर अलग-अलग नजरियों की दुनिया में पहुंच चुका है।
स्रोत:
Deccan Herald, India Today, Ministry of Home Affairs data reports, Outlook India, Business Standard, Open Magazine, News18, The Hindu, PolSci Institute analysis, Aeon Essays, Swarajya, CNN reporting on the insurgency, और 1967 के विद्रोह तथा 2004 में CPI (Maoist) के विलय की समकालीन रिपोर्टिंग।
@रोहित मनराल