‘अमेरिका में रहते हैं तो अमेरिका के प्रति सच्चे रहें’: मोहन भागवत ने भारतीय डायस्पोरा से कहा- ‘कर्मभूमि’ का कर्तव्य निभाएं

मोहन भागवत का अमेरिका में भारतीयों को संदेश: कर्मभूमि के प्रति वफादार रहें

न्यूयॉर्क, 30 अगस्त: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के प्रमुख मोहन भागवत ने शनिवार को मैडिसन स्क्वायर गार्डन के इन्फोसिस थिएटर में अमेरिका में रह रहे भारतीय समुदाय को संबोधित किया। 6,000 से अधिक भारतीय-अमेरिकियों और विभिन्न धर्मों के नेताओं से खचाखच भरे हॉल में भागवत ने भारतीय प्रवासियों की जिम्मेदारियों को लेकर स्पष्ट संदेश दिया। उन्होंने कहा कि भारत आपकी जन्मभूमि है, लेकिन जिस देश में आप वर्तमान में रहते हैं, काम करते हैं और कमाते हैं, वह आपकी कर्मभूमि है। इसलिए सबसे पहले अपनी कर्मभूमि के प्रति कर्तव्य निभाना चाहिए।

भागवत ने कहा, “हमारा कर्तव्य क्या है? हम अमेरिका में हैं, अमेरिका में रहते हैं, अमेरिका में कमाते हैं। इसलिए हम अमेरिकी हैं। और हमें अमेरिका के प्रति सच्चा व्यवहार करना चाहिए।” उन्होंने कहा कि भारतीय डायस्पोरा का अपनी कर्मभूमि के प्रति कर्तव्य है और उन्हें उसे पूरा करना चाहिए। उन्होंने जोर देते हुए कहा कि प्रवासियों को अपनी कर्मभूमि के प्रति वफादार रहना चाहिए।

यह कार्यक्रम ‘यूनिवर्सल ऑननेस सेलिब्रेशन’ के नाम से आयोजित किया गया था। इसका आयोजन American Hindus for Engagement and Dialogue (AHEAD) ने किया था। करीब एक घंटे के अपने संबोधन में भागवत ने सभ्यतागत विचारों के साथ-साथ अमेरिका में अपना जीवन बनाने वाले भारतीय समुदाय के लिए व्यावहारिक संदेश भी दिए। उन्होंने प्रवासियों से भारत से मुंह मोड़ने को नहीं कहा, बल्कि प्राथमिकताओं का क्रम स्पष्ट किया।

भागवत ने कहा कि अगर अमेरिका में अपनी जिम्मेदारियां पूरी करने के बाद किसी व्यक्ति के मन में भारत के लिए कुछ करने की इच्छा होती है, तो इसमें कोई परेशानी नहीं है। उन्होंने कहा, “यह प्रतिबंधित नहीं है, लेकिन अनिवार्य भी नहीं है।” उनके मुताबिक भारत अपने प्रवासियों से यह जरूर अपेक्षा करता है कि वे अपनी मातृभूमि से मिले मूल्यों को अपने दैनिक जीवन में अपनाएं। उनके अनुसार इनमें सबसे महत्वपूर्ण मूल्य ‘एकत्व’ या ‘ऑननेस’ है—यानी यह भावना कि सभी मनुष्य और प्रकृति एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं।

भागवत ने अमेरिका की बहुलतावादी सोच की तुलना भारत की लंबे समय से चली आ रही ‘विविधता में एकता’ की अवधारणा से की। उन्होंने कहा कि दोनों समाजों के डीएनए में यह विचार मौजूद है।

उन्होंने कहा, “हम एक हैं और विविधता के कारण यह एकत्व और भी सुंदर बनता है। इसलिए विविधता का उत्सव मनाना, उसका सम्मान करना और उसे स्वीकार करना जरूरी है। साथ ही, हमें एकत्व की इस भावना को भी ध्यान में रखना चाहिए।”

इस विचार को स्पष्ट करने के लिए उन्होंने स्वामी विवेकानंद का भी उल्लेख किया। भागवत ने कहा कि हर राष्ट्र के सामने अपने भाग्य और उद्देश्य को पूरा करने की जिम्मेदारी होती है। उनके अनुसार भारत की भूमिका दुनिया को यह दिखाना है कि एकता और विविधता एक साथ रह सकती हैं। यह केवल भाषणों के माध्यम से नहीं, बल्कि व्यवहार और जीवन में इसे अपनाकर दिखाया जाना चाहिए।

अपने संबोधन में भागवत ने प्रवासी भारतीयों के मुद्दे से आगे बढ़कर भौतिक सफलता की सीमाओं पर भी बात की। उन्होंने संकेत दिया कि अच्छी कमाई करना और ज्यादा से ज्यादा चीजें हासिल करना ही जीवन की पूरी सफलता नहीं है। उन्होंने कहा कि इंसान किसानों, श्रमिकों, परिवारों और व्यापक समाज पर निर्भर रहता है। इसलिए समाज से मिलने वाली मदद के बदले समाज को कुछ वापस देने की जिम्मेदारी भी बनती है।

उन्होंने विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन की आवश्यकता पर भी बात की। भागवत ने कहा कि पुरानी भारतीय सोच में मौजूद संतुलन की अवधारणा ऐसा रास्ता दिखा सकती है, जिसमें न तो प्रकृति को नुकसान पहुंचाया जाए और न ही विकास को पूरी तरह रोक दिया जाए।

अमेरिका में रहने वाले भारतीय समुदाय के लिए भागवत की ‘कर्मभूमि’ वाली बात विशेष महत्व रखती है। बड़ी संख्या में भारतीय-अमेरिकी तकनीक, चिकित्सा, कारोबार और शिक्षा जैसे क्षेत्रों में सफल करियर बना चुके हैं। वे भारत में अपने परिवारों से जुड़े रहते हैं, पैसे भेजते हैं और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में हिस्सा लेते हैं। वहीं दूसरी ओर वे अमेरिका में टैक्स देते हैं, अपने बच्चों की परवरिश करते हैं और स्थानीय समुदायों में भी योगदान देते हैं।

भागवत की बात ने इस दोहरी वास्तविकता को एक स्पष्ट भाषा दी—जहां आप रहते हैं, वहां पहले एक अच्छे नागरिक बनें। भारत से आपका संबंध आपके मूल्यों के जरिए बना रहे और परिस्थितियां अनुमति दें तो भारत के लिए स्वेच्छा से कुछ करना भी स्वागत योग्य है।

उन्होंने भारत के प्रति किसी तरह की अनिवार्यता पैदा करने से भी परहेज किया। भागवत ने कहा कि “आपकी जन्मभूमि आपसे उन मूल्यों के अनुसार जीने की अपेक्षा करती है, जो उसने आपको दिए हैं।” उनके अनुसार यह अपेक्षा सांस्कृतिक और नैतिक है, न कि आर्थिक या राजनीतिक।

उन्होंने एकत्व की भावना को जीवन में उतारने, विविधता का सम्मान करने और उस समाज को कुछ वापस देने की बात कही, जो व्यक्ति को आगे बढ़ने में मदद करता है। उनके मुताबिक इसी तरह भारतीय प्रवासी अमेरिका के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाते हुए भारत के साथ अपने संबंधों को भी बनाए रख सकते हैं।

कार्यक्रम भी उन्हीं विचारों को प्रतिबिंबित करता नजर आया, जिनका भागवत ने अपने भाषण में उल्लेख किया। भागवत से पहले विभिन्न धर्मों के नेताओं ने एकता, एकत्व और आपसी सहयोग की बात की। कार्यक्रम में अलग-अलग पेशों, भारत के अलग-अलग हिस्सों और अलग-अलग पीढ़ियों से जुड़े लोग मौजूद थे। इनमें कुछ लोग कई दशक पहले अमेरिका पहुंचे थे, जबकि कुछ अपेक्षाकृत हाल के वर्षों में वहां गए थे।

न्यूयॉर्क के सबसे प्रसिद्ध स्थलों में से एक मैडिसन स्क्वायर गार्डन में आयोजित यह कार्यक्रम अमेरिका में भारतीय समुदाय की मजबूत और स्थापित उपस्थिति को भी दर्शाता है।

भागवत के ये विचार उनके सार्वजनिक भाषणों में अक्सर दिखाई देने वाली व्यापक सोच का हिस्सा हैं। वह अक्सर इस बात पर जोर देते हैं कि राष्ट्र केवल नक्शे पर बनी सीमाएं नहीं होते, बल्कि सभ्यताओं की भी अपनी जिम्मेदारियां होती हैं। न्यूयॉर्क में उन्होंने इसी विचार को उन लोगों पर लागू किया, जो दो जगहों के बीच अपना जीवन बना रहे हैं।

उनका संदेश था कि जिस जगह से आपको काम और आजीविका मिलती है, उसके प्रति वफादार रहें। जिस स्थान ने आपको संस्कार और मूल्य दिए हैं, उसकी गहरी विरासत को अपने जीवन में बनाए रखें। दोनों संबंधों को बोझ या लेन-देन की तरह देखने की जरूरत नहीं है।

अपने भाषण के अंत तक भागवत का केंद्रीय संदेश अलग-अलग शब्दों में बार-बार सामने आया, लेकिन उसका अर्थ एक ही रहा—अमेरिका में रहते हैं तो अमेरिका के प्रति सच्चे रहें और अपनी कर्मभूमि के कर्तव्यों को पूरा करें। जन्मभूमि आपके द्वारा रोजमर्रा के जीवन में अपनाए गए मूल्यों में बनी रहेगी। अगर इसके बाद भारत के लिए कुछ करने की इच्छा होती है तो उसका स्वागत है, लेकिन इसे अनिवार्य नहीं माना गया है।

भागवत का यह संबोधन भारतीय समुदायों के बीच तेजी से चर्चा में है और भारत में भी इसकी मीडिया कवरेज हो रही है। कार्यक्रम में मौजूद लोगों और बाद में ऑनलाइन इस भाषण को सुनने वालों के लिए यह संदेश दो जगहों से जुड़े होने की स्थिति को समझने का एक व्यावहारिक और सम्मानजनक तरीका पेश करता है—बिना किसी अपराधबोध या टकराव के और प्राथमिकताओं की स्पष्ट समझ के साथ।

स्रोत: Hindustan Times, India Today, ANI, IANS, The Times of India, ThePrint (PTI), India TV, The Indian Express, Rediff, News9live — 30 अगस्त 2026 की रिपोर्ट्स, जिनमें 29 अगस्त 2026 को न्यूयॉर्क के मैडिसन स्क्वायर गार्डन में आयोजित ‘Universal Oneness Celebration’ में मोहन भागवत के संबोधन को कवर किया गया है।

@रोहित मनराल

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