शी की संभावित भारत यात्रा और ‘अर्ली हार्वेस्ट’ पर नजर, डोभाल बीजिंग रवाना

डोभाल का बीजिंग दौरा: शी जिनपिंग की भारत यात्रा पर नजर

अजीत डोभाल इस सप्ताह बीजिंग जा रहे हैं। भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार चीन के विदेश मंत्री वांग यी के साथ सीमा मुद्दे पर विशेष प्रतिनिधियों की 25वीं दौर की वार्ता करेंगे। औपचारिक बैठकें सोमवार और मंगलवार को निर्धारित हैं।

इस वार्ता का समय काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। भारत सितंबर के मध्य में BRICS शिखर सम्मेलन की मेजबानी कर रहा है और सभी की नजर इस बात पर है कि क्या चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग इसमें शामिल होंगे। अगर ऐसा होता है, तो यह सात वर्षों में उनकी पहली भारत यात्रा होगी। डोभाल की बातचीत अगर सकारात्मक रहती है, तो इससे शी की भारत यात्रा का रास्ता साफ होने में मदद मिल सकती है और संभव है कि सम्मेलन से इतर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और शी जिनपिंग की एक और मुलाकात भी हो।

हालांकि बातचीत का मुख्य मुद्दा सीमा ही रहेगा, लेकिन यह बैठक केवल सीमा विवाद तक सीमित नहीं है। दोनों पक्ष यह भी देखना चाहते हैं कि भारत-चीन के व्यापक संबंध इस समय किस स्थिति में हैं। 2020 में पूर्वी लद्दाख में हुई झड़पों के बाद लंबे समय तक रिश्तों में आई ठंडक के बाद, 2024 के अंत से धीरे-धीरे स्थिति आगे बढ़ रही है। उसी साल कज़ान में मोदी-शी की मुलाकात ने बातचीत के लिए एक छोटी सी खिड़की खोली थी। पिछले अगस्त में तियानजिन में दोनों नेताओं की फिर मुलाकात हुई और दोनों ने कहा कि वे एक-दूसरे को विकास साझेदार के रूप में देखते हैं, प्रतिद्वंद्वी के तौर पर नहीं, तथा मतभेदों को खुले संघर्ष में नहीं बदलना चाहिए।

इसके बाद से कदम काफी सावधानी से उठाए गए हैं—उड़ानें फिर शुरू हुईं, कुछ वीजा नियमों में ढील दी गई, कैलाश-मानसरोवर यात्रा फिर शुरू हुई और नाथू ला तथा लिपुलेख के रास्ते सीमा व्यापार में भी बढ़ोतरी हुई।

विशेष प्रतिनिधियों की व्यवस्था खुद काफी पुरानी है। इसकी शुरुआत 2003 में लगभग 3,500 किलोमीटर लंबी सीमा के पूर्ण समाधान की कोशिश के उद्देश्य से हुई थी। हालांकि इसमें प्रगति हमेशा धीमी रही है। गलवान की घटना के बाद यह बातचीत लगभग पांच वर्षों तक रुक गई थी। दिसंबर 2024 में जाकर यह प्रक्रिया फिर से ठीक तरह शुरू हुई।

पिछले साल दिल्ली में हुई बैठक में एक व्यावहारिक समझौता हुआ था। मौजूदा सीमा समन्वय तंत्र के तहत एक विशेषज्ञ समूह बनाने पर सहमति बनी, जो तथाकथित “अर्ली हार्वेस्ट” यानी ऐसे छोटे और सीमित समझौतों पर काम करेगा, जहां मतभेद बहुत ज्यादा नहीं हैं, जबकि बड़े और व्यापक ढांचे पर बातचीत जारी रहेगी।

इस सप्ताह भी ‘अर्ली हार्वेस्ट’ का मुद्दा बातचीत में उठने की उम्मीद है। दोनों देशों के अधिकारियों ने 6 अगस्त को Working Mechanism के तहत बैठक की थी, जिसमें सीमा का सीमांकन, सीमा प्रबंधन, नए तंत्र और सीमा-पार सहयोग जैसे मुद्दों पर चर्चा हुई। कुछ लोगों का मानना है कि उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के मध्य क्षेत्र तथा सिक्किम में कुछ सीमित और व्यावहारिक समझौते संभव हो सकते हैं। दोनों पक्षों ने पूर्वी और मध्य क्षेत्रों में जनरल-स्तर के सैन्य तंत्र स्थापित करने की संभावना पर भी चर्चा की है, ताकि पश्चिमी क्षेत्र में पहले से मौजूद व्यवस्था के अनुरूप एक समान तंत्र बनाया जा सके।

हालांकि किसी बड़े breakthrough की उम्मीद नहीं की जा रही है। पश्चिमी और पूर्वी दोनों सेक्टर अभी भी जटिल बने हुए हैं और इस महीने अरुणाचल प्रदेश में तनाव की नई खबरें भी सामने आई हैं, जहां दोनों पक्षों की ओर से सार्वजनिक रूप से तीखे बयान दिए गए। चीन का कहना है कि सीमा पर स्थिति “सामान्य रूप से स्थिर” है। वहीं भारत लगातार यह दोहराता रहा है कि Line of Actual Control (LAC) पर शांति और स्थिरता किसी भी अन्य क्षेत्र में संबंधों को आगे बढ़ाने की मूल शर्त है। विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने हाल ही में फिर यही बात कही थी।

फिर भी डोभाल का बीजिंग जाना दोनों देशों के बीच उच्चस्तरीय संवाद को जारी रखता है। दिसंबर 2024 में प्रक्रिया दोबारा शुरू होने के बाद सीमा वार्ता के लिए यह उनकी पहली बीजिंग यात्रा है। जून में दिल्ली में BRICS राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों की बैठक के दौरान डोभाल और वांग यी की अनौपचारिक मुलाकात हुई थी और दोनों ने माना था कि संबंध धीरे-धीरे सामान्य स्थिति की ओर बढ़ रहे हैं। मंगलवार की बैठक पिछले अगस्त के बाद पहली औपचारिक सीमा वार्ता होगी।

अजीत डोभाल के बीजिंग दौरे में भारत-चीन सीमा वार्ता, ‘अर्ली हार्वेस्ट’ और शी जिनपिंग की संभावित भारत यात्रा पर अहम चर्चा की उम्मीद।

इन बैठकों से निकलने वाले नतीजों को संभवतः बेहद सावधानी से देखा जाएगा। अगर भाषा शांत और कामकाजी रहती है, तो यह संकेत होगा कि दोनों देशों के बीच स्थिरीकरण की प्रक्रिया कायम है। विशेषज्ञ समूह की प्रगति का कोई उल्लेख या नए confidence-building measures की घोषणा छोटे लेकिन वास्तविक कदम के तौर पर देखी जाएगी।

हालांकि बड़े सवाल—पूरी सीमा का समाधान, व्यापार असंतुलन और बदलते क्षेत्रीय माहौल में दोनों देशों द्वारा अपने मतभेदों को संभालने का तरीका—फिलहाल बाद के लिए बने रहेंगे।

अभी के लिए फोकस व्यावहारिक है। बातचीत जारी रखना, तनाव को कम रखना और यह देखना कि 2024 के बाद उठाए गए सावधानीपूर्ण कदम आगे भी जारी रह सकते हैं या नहीं।

अगर बैठकें सुचारु रूप से होती हैं, तो अगले महीने शी जिनपिंग के दिल्ली आने की संभावना बनी रहेगी। ऐसे रिश्ते में, जो कभी गहरे तनाव और कभी सावधानीपूर्ण सुधार के बीच झूलता रहा है, शांत और बिना किसी बड़े शोर के होने वाला लगातार काम भी महत्वपूर्ण माना जाता है।

स्रोत:

यह खबर The Hindu में अनंत कृष्णन की रिपोर्टिंग, PTI की रिपोर्ट्स, विदेश मंत्रालय की ब्रीफिंग, चीनी विदेश मंत्रालय के बयानों तथा NDTV, India Today, The Statesman और Hindustan Times की रिपोर्टिंग से तैयार की गई है।

@रोहित मनराल

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Scroll to Top