‘एक हफ्ते में U-Turn’: अमित शाह से मुलाकात के बाद परिसीमन के रुख पर DMK ने विजय पर साधा निशाना

DMK का विजय पर हमला, परिसीमन मुद्दे पर U-Turn का आरोप

तमिलनाडु की राजनीति में बदला परिसीमन का रुख

तमिलनाडु की राजनीति में रुख तेजी से बदल सकता है और गुरुवार का दिन इसका एक उदाहरण रहा। DMK ने मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय पर परिसीमन के मुद्दे पर महज एक हफ्ते के भीतर अपना रुख पूरी तरह बदलने का आरोप लगाया। इसकी वजह चेंगलपट्टू में दक्षिणी क्षेत्रीय परिषद की बैठक के दौरान विजय की केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से हुई मुलाकात बनी।

कुछ दिन पहले विधानसभा ने पारित किया था प्रस्ताव

कुछ ही दिन पहले तमिलनाडु विधानसभा ने एक स्पष्ट प्रस्ताव पारित किया था। इसमें कहा गया था कि लोकसभा की कुल सीटों की संख्या 543 पर ही स्थिर रहनी चाहिए और प्रत्येक राज्य की मौजूदा सीट हिस्सेदारी में कोई बदलाव नहीं होना चाहिए।

विजय सरकार ने इस मांग को जोरदार तरीके से आगे बढ़ाया था। उनकी पार्टी TVK ने भी महीने की शुरुआत में सांसदों की एक सर्वदलीय बैठक बुलाई थी, जिसमें इसी तरह की मांग रखी गई थी। उस समय संदेश बिल्कुल स्पष्ट माना जा रहा था—ऐसी सीटों की पुनर्व्यवस्था नहीं होनी चाहिए, जिससे संसद में दक्षिण भारत की आवाज कमजोर हो।

अमित शाह के सामने विजय का नरम रुख

इसके बाद गुरुवार को स्थिति कुछ अलग दिखाई दी। अपने ही राज्य में आयोजित दक्षिणी क्षेत्रीय परिषद की बैठक में बोलते हुए विजय ने अपेक्षाकृत नरम रुख अपनाया।

उन्होंने केंद्र से कानूनी तौर पर पुख्ता आश्वासन देने की मांग की कि किसी भी राज्य की संसद में सीटों की प्रतिशत हिस्सेदारी सिर्फ इसलिए कम नहीं की जाएगी क्योंकि उस राज्य ने अपनी जनसंख्या को नियंत्रित करने में सफलता हासिल की है।

विजय ने कहा कि दक्षिणी राज्यों ने जनसंख्या स्थिरीकरण, मानव विकास और आर्थिक विकास के क्षेत्र में अच्छा प्रदर्शन किया है और इन उपलब्धियों की सजा उन्हें उनके राजनीतिक प्रतिनिधित्व में कटौती के रूप में नहीं मिलनी चाहिए।

543 सीटों की मांग दोहराने से क्यों बना विवाद?

विजय के बयान में जो कहा गया, वह महत्वपूर्ण था, लेकिन जो नहीं कहा गया, वह भी उतना ही महत्वपूर्ण बन गया।

उन्होंने लोकसभा की कुल सीटों की संख्या को 543 पर स्थिर रखने की मांग दोबारा नहीं दोहराई। इसी अंतर पर विपक्ष ने तुरंत ध्यान दिया।

DMK ने सोशल मीडिया पर साधा निशाना

अमित शाह से मुलाकात के बाद DMK ने मुख्यमंत्री विजय पर परिसीमन मुद्दे पर एक हफ्ते में U-Turn लेने का आरोप लगाया। जानें पूरा विवाद।

DMK की IT विंग ने सोशल मीडिया पर विजय के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। एक पोस्ट में कहा गया कि मुख्यमंत्री विजय ने अमित शाह के सामने परिसीमन के मुद्दे पर पहले कड़ा रुख अपनाया था और उसी सप्ताह 543 सीटों की संख्या न बढ़ाने का प्रस्ताव पारित किया था, लेकिन अब उन्होंने अपना रुख बदल लिया है।

एक अन्य पोस्ट में सवाल किया गया कि क्या मुख्यमंत्री विजय ने महज एक हफ्ते में निर्वाचन क्षेत्रों के पुनर्निर्धारण के मुद्दे पर U-Turn कर लिया है? DMK ने TVK के गठबंधन सहयोगियों को भी निशाना बनाया और पूछा कि क्या कोई इस कथित दोहरे रुख पर सवाल उठाएगा।

AIADMK और AMMK ने भी घेरा

DMK प्रवक्ता सरवनन अन्नादुरई ने सीधे तौर पर कहा कि मुख्यमंत्री ने इस मुद्दे पर अपना रुख बदल लिया है।

AIADMK की IT विंग भी इस हमले में शामिल हो गई। उसने कहा कि TVK सरकार ने परिसीमन के मुद्दे पर पूरा U-Turn ले लिया है और अब उसका रुख केंद्र सरकार जैसा ही दिखाई दे रहा है।

AMMK नेता T.T.V. दिनाकरन ने पूरे घटनाक्रम को राजनीतिक ड्रामा बताया और कहा कि इसका उद्देश्य राज्य की अन्य समस्याओं से ध्यान भटकाना है।

दक्षिणी क्षेत्रीय परिषद की बैठक में उठे तीन प्रमुख मुद्दे

इस पूरे घटनाक्रम का मंच भी आलोचना को और ज्यादा तीखा बनाने वाला था। दक्षिणी क्षेत्रीय परिषद की बैठक की अध्यक्षता अमित शाह कर रहे थे।

बैठक में तमिलनाडु, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और केरल के मुख्यमंत्रियों तथा दक्षिणी केंद्र शासित प्रदेशों के वरिष्ठ अधिकारियों ने हिस्सा लिया।

विजय ने इस मंच पर तीन प्रमुख मुद्दे उठाए:

  • परिसीमन से राज्यों के प्रतिनिधित्व की सुरक्षा
  • तमिलनाडु के छात्रों के लिए NEET से छूट
  • नशीली दवाओं की तस्करी और अवैध ऑनलाइन दवाओं की बिक्री के खिलाफ कड़ी कार्रवाई

परिसीमन को लेकर दक्षिण भारत की चिंता क्या है?

परिसीमन को लेकर दक्षिण भारत की चिंता पुरानी और गंभीर है। 1971 की जनगणना के आधार पर लोकसभा सीटों पर लगी रोक अब समाप्त होने की ओर है।

यदि आज की जनसंख्या के आधार पर सीटों का पुनर्वितरण किया जाता है, तो जिन उत्तरी राज्यों की जनसंख्या तेजी से बढ़ी है, उन्हें ज्यादा सीटें मिल सकती हैं। वहीं तमिलनाडु जैसे राज्यों, जिन्होंने जनसंख्या वृद्धि को नियंत्रित किया है, की मौजूदा हिस्सेदारी कम हो सकती है।

फिलहाल तमिलनाडु के पास लोकसभा की कुल सीटों का लगभग 7.18 प्रतिशत हिस्सा है। इसमें थोड़ी भी कमी को केवल संख्या में बदलाव के तौर पर नहीं देखा जाता, बल्कि इसे भाषा, संस्कृति और संघीय मुद्दों पर राज्य के राजनीतिक प्रभाव में कमी के रूप में भी देखा जाता है।

विजय के नए बयान का क्या मतलब निकाला जा रहा है?

विजय की नई शब्दावली—यानी कुल सीटों की संख्या को जरूरी तौर पर 543 पर स्थिर रखने के बजाय राज्यों की मौजूदा प्रतिशत हिस्सेदारी की रक्षा करना—इस संभावना के लिए जगह छोड़ती है कि लोकसभा का कुल आकार बढ़ सकता है।

हालांकि, ऐसी स्थिति में यह सुनिश्चित किया जाना होगा कि जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन करने वाले राज्यों को उनके प्रतिनिधित्व के मामले में नुकसान न हो।

विजय सरकार के मंत्रियों ने बाद में जोर देकर कहा कि सीटों को 543 पर बनाए रखने की सरकार की स्थिति में कोई बदलाव नहीं हुआ है। ऊर्जा एवं कानून मंत्री सी.टी.आर. निर्मलकुमार ने बैठक के बाहर भी यही बात कही।

लेकिन दोनों बयानों की भाषा में अंतर साफ दिखाई दिया और विपक्ष ने इसका पूरा राजनीतिक फायदा उठाया।

परिसीमन सिर्फ सीटों और आंकड़ों का मुद्दा नहीं

यह पूरा घटनाक्रम दिखाता है कि तमिलनाडु की राजनीतिक पार्टियां परिसीमन के मुद्दे पर कितनी सावधानी से आगे बढ़ रही हैं।

परिसीमन केवल नक्शे और आंकड़ों का विषय नहीं है। यह संघीय संतुलन और क्षेत्रीय गौरव से सीधे जुड़ा हुआ है।

वर्षों से तमिलनाडु की सरकारें किसी भी ऐसे कदम का विरोध करती रही हैं, जिससे संसद में दक्षिण भारत की आवाज कमजोर हो सकती है। विजय ने भी पहले इसके खिलाफ मजबूती से बोलते हुए कहा था कि तमिलनाडु किसी को भी राज्य का स्थान और प्रभाव कम करने की अनुमति नहीं देगा।

केंद्र के रुख के बीच बढ़ी राजनीतिक बहस

अब जब केंद्र सरकार किसी नए विधेयक को जल्दबाजी में आगे नहीं बढ़ा रही है और पहले भी दक्षिणी राज्यों के प्रतिनिधित्व में कमी नहीं होने देने के आश्वासन दिए जा चुके हैं, ऐसे में सावधानी से शब्दों का इस्तेमाल करने की गुंजाइश बढ़ गई है।

कुछ लोग विजय के बयान को व्यावहारिक राजनीतिक जुड़ाव के तौर पर देख रहे हैं। वहीं DMK इसे मजबूत विधानसभा प्रस्ताव के बाद लिया गया कदम पीछे हटने वाला रुख बता रही है।

परिसीमन की बहस अभी खत्म नहीं

दिन खत्म होने तक एक बात साफ थी—परिसीमन की बहस अभी खत्म होने से काफी दूर है।

आने वाले समय में यह मुद्दा लगातार यह परीक्षा लेगा कि तमिलनाडु के नेता राज्य के दीर्घकालिक हितों को लेकर एक साझा रुख बनाए रख पाते हैं या नहीं।

फिलहाल DMK ने इस मुद्दे पर स्पष्ट राजनीतिक रेखा खींच दी है और उसका आरोप है कि मुख्यमंत्री ने केवल एक सप्ताह के भीतर अपना रुख बदल लिया।

यह बदलाव वास्तव में नीति में परिवर्तन है या फिर केंद्रीय गृह मंत्री के सामने इस्तेमाल की गई सावधानीपूर्ण भाषा, इस पर आने वाले दिनों में तमिलनाडु की राजनीति में बहस जारी रहने की संभावना है।

स्रोत:

Times of India, Hindustan Times, Mathrubhumi, Moneycontrol, India Today, The Federal, The Week, ABP Live.

@रोहित मनराल

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