
मुंबई, 6 अगस्त 2026 — राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने गुरुवार को युवाओं के साथ एक खुली बातचीत के दौरान स्पष्ट कहा कि यदि भारत की जेन Z अपनी आवाज़ उठाती है या किसी मुद्दे पर आंदोलन करती है, तो इसका मतलब यह नहीं कि वह देशविरोधी हो गई है। उन्होंने कहा कि यह नई पीढ़ी इसी देश की है और विरोध करने से उनका इस देश से संबंध खत्म नहीं हो जाता।
मुंबई के नीता मुकेश अंबानी कल्चरल सेंटर में इंटरनेशनल मूवमेंट टू यूनाइट नेशंस (IIMUN) की 15वीं वर्षगांठ के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में करीब 2,000 जेन Z और जेन अल्फा के छात्रों को संबोधित करते हुए भागवत ने कहा, “मैं यह स्पष्ट करना चाहता हूं कि अगर जेन Z किसी आंदोलन में हिस्सा लेती है, तो वे देशविरोधी नहीं हैं। वे हमारे अपने लोग हैं, हमारी अगली पीढ़ी हैं।”
उन्होंने कहा कि पीढ़ियों के बीच बातचीत की शुरुआत अपनापन और आपसी सम्मान से होनी चाहिए। तभी ऐसा सार्थक संवाद संभव होगा, जिसमें बड़े लोग युवाओं की चिंताओं को समझ सकें और युवा भी अपने से पहले की पीढ़ी के अनुभवों और दृष्टिकोण को जान सकें।
भागवत की यह टिप्पणी हाल के छात्र आंदोलनों की पृष्ठभूमि में आई है, खासकर NEET परीक्षा में कथित अनियमितताओं और पेपर लीक को लेकर हुए विरोध प्रदर्शनों के संदर्भ में। इन प्रदर्शनों ने दिल्ली समेत कई राज्यों में जोर पकड़ा था, जहां पुलिस कार्रवाई, आंसू गैस और कुछ रिपोर्टों के अनुसार पैलेट गन के इस्तेमाल की भी खबरें सामने आई थीं।
हालांकि भागवत ने इन घटनाओं पर कोई अंतिम टिप्पणी करने से इनकार किया। उन्होंने कहा कि उनके पास पूरी और सत्यापित जानकारी नहीं है, इसलिए वे किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंचना चाहते। लेकिन उन्होंने अपनी व्यक्तिगत राय स्पष्ट करते हुए कहा, “मैं जेन Z पर आंख बंद करके भरोसा करूंगा।”
उन्होंने कहा कि शिक्षा व्यवस्था को लेकर युवाओं की जो शिकायतें हैं, वे वास्तविक हैं। उनके शब्दों में, “भारतीय शिक्षा व्यवस्था में अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है। जब सुधार नहीं होते, तब उन पर चर्चा होती है।”
भागवत के अनुसार, लोकतंत्र में विरोध प्रदर्शन भी संवाद का एक माध्यम है। जब लोगों की बात सामान्य तरीकों से नहीं सुनी जाती, तब वे आंदोलन का रास्ता अपनाते हैं। लेकिन ऐसे आंदोलनों का उद्देश्य समाज में सहमति बनाना और व्यवस्था में सुधार करना होना चाहिए, न कि विभाजन पैदा करना या किसी व्यक्ति को निशाना बनाना।
अपने संबोधन के दौरान उन्होंने बार-बार नई पीढ़ी के स्वभाव की चर्चा की। उन्होंने कहा कि जेन Z और जेन अल्फा मौजूदा पीढ़ी की तुलना में अधिक ईमानदार हैं। उनमें देशभक्ति और समाज सेवा की भावना के प्रति सच्ची संवेदनशीलता है। उन्होंने कहा कि पहले की पीढ़ियां बिना सवाल किए बड़ों की बात मान लेती थीं, लेकिन आज के युवा हर बात का तार्किक जवाब चाहते हैं और साथ ही सम्मान और अपनापन भी चाहते हैं।
भागवत ने कहा, “जब हम जेन Z की उम्र में थे, तब हम अपने बड़ों की बात बिना सवाल किए मान लेते थे। लेकिन आज की जेन Z हर बात का तार्किक उत्तर चाहती है।”
उन्होंने स्पष्ट कहा कि वे कभी भी युवाओं से यह नहीं कहेंगे कि उन्हें विरोध नहीं करना चाहिए। उनका मानना है कि लोकतंत्र में विरोध के भी संवैधानिक तरीके हैं और डॉ. भीमराव अंबेडकर द्वारा बताए गए सिद्धांत आज भी उसी लोकतांत्रिक व्यवस्था का आधार हैं। यदि युवा आवाज़ उठा रहे हैं, तो उसका उद्देश्य केवल विरोध करना नहीं बल्कि व्यवस्था में सुधार लाना है। ऐसे में समाज की जिम्मेदारी है कि वह उन्हें देशविरोधी कहने के बजाय उनकी बात सुने और संवाद करे।
कार्यक्रम के दौरान छात्रों ने शिक्षा, रोजगार, आरक्षण, सोशल मीडिया और देश से जुड़े कई अन्य मुद्दों पर सवाल पूछे। भागवत ने सभी सवालों का सीधे जवाब दिया। बातचीत के दौरान उन्होंने युवाओं द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले एक लोकप्रिय आधुनिक शब्द का भी प्रयोग किया, जिस पर सभागार में हंसी और तालियां गूंज उठीं। पूरे कार्यक्रम का माहौल भाषण से अधिक संवाद का रहा, जहां एक वरिष्ठ नेता देश के भविष्य मानी जाने वाली पीढ़ी से खुलकर बातचीत कर रहे थे।

भागवत की इस टिप्पणी को इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि वे जिस संगठन का नेतृत्व करते हैं, उसका सार्वजनिक और वैचारिक प्रभाव व्यापक है। हाल के दिनों में छात्र आंदोलनों को लेकर सार्वजनिक विमर्श के कुछ हिस्सों में प्रदर्शनकारियों की मंशा पर सवाल उठाए जा रहे थे। ऐसे समय में उनका यह कहना कि युवा “हमारे अपने हैं” और विरोध करने से कोई देशविरोधी नहीं हो जाता, पूरे विमर्श को संवाद और समझ की दिशा में ले जाने का प्रयास माना जा रहा है।
उन्होंने बेहतर संवाद की आवश्यकता पर भी जोर दिया। उनके अनुसार, किसी भी समस्या का पहला समाधान बातचीत होना चाहिए। यदि कोई ऐसी घटना होती है जो नहीं होनी चाहिए थी, तो इसका मतलब है कि कहीं न कहीं व्यवस्था में कोई कमी है, जिसे दूर करना जरूरी है। जिम्मेदारी किसकी है, इस पर बाद में चर्चा हो सकती है, लेकिन सबसे पहले उस कमी को पहचानकर उसे सुधारना आवश्यक है।
कार्यक्रम के अंत तक उनका मुख्य संदेश यही रहा कि टकराव नहीं, बल्कि संबंध और संवाद लोकतंत्र की असली ताकत हैं। नई पीढ़ी सवाल पूछती है और तार्किक उत्तर चाहती है। वहीं बड़ी पीढ़ी की जिम्मेदारी है कि वह उन्हें तर्क के साथ-साथ सम्मान और अपनापन भी दे। तभी वह लोकतांत्रिक संवाद संभव होगा, जिसकी किसी भी समाज को आवश्यकता होती है।
स्रोत:
इंडिया टुडे, द इंडियन एक्सप्रेस, द टाइम्स ऑफ इंडिया, लाइवमिंट, द स्टेट्समैन, फर्स्टपोस्ट, टाइम्स नाउ, एनडीटीवी, डेक्कन हेराल्ड, आउटलुक इंडिया, द हिंदू, पीटीआई, एएनआई (6 अगस्त 2026 की रिपोर्ट्स)अगर चाहो, मैं इसे 100% न्यूज़ वेबसाइट स्टाइल (दैनिक भास्कर/आज तक/NDTV इंडिया) में भी फ्रेम कर सकता हूँ ताकि पढ़ने में और अधिक प्रोफेशनल लगे।
@रोहित मनराल