23 जुलाई को लद्दाख के शांत लेकिन बेहद मजबूत व्यक्तित्व वाले सोनम वांगचुक ने गुरुग्राम के मेदांता अस्पताल में अपना 26 दिन लंबा अनशन समाप्त किया। उस समय उनके साथ केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा और डॉ. जितेंद्र सिंह मौजूद थे। कोई बड़ा राजनीतिक प्रदर्शन या औपचारिक समारोह नहीं था। उन्होंने पौष्टिक पेय की कुछ घूंट लीं, चेहरे पर थकान साफ दिख रही थी लेकिन मन में एक सुकून भी था। उनकी पत्नी गीतांजलि पूरे समय उनके साथ थीं। यह किसी भव्य आयोजन जैसा नहीं, बल्कि एक लंबी और कठिन लड़ाई के बीच मिला सच्चा और भावुक विराम था।
सोनम सर – जैसा कि बहुत से लोग उन्हें प्यार से बुलाते हैं – उन एक्टिविस्टों में से नहीं हैं जो कैमरों के सामने शोर मचाते हैं। वे वही इंजीनियर हैं जिन्होंने लद्दाख के गांवों में लोगों को बर्फ के स्तूप (Ice Stupa) बनाना सिखाया ताकि उस बर्फीले रेगिस्तान में पानी का संरक्षण हो सके। उन्होंने कई बार गिरफ्तारी झेली, पहले भी अनशन किए, सैकड़ों किलोमीटर पैदल यात्राएं कीं और यह सब अपने लोगों के अधिकारों, पर्यावरण और हिमालय की नाज़ुक पारिस्थितिकी की रक्षा के लिए किया। इस बार उन्होंने शिक्षा व्यवस्था में गड़बड़ियों के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे छात्रों और कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के आंदोलन का समर्थन किया। खासतौर पर NEET पेपर लीक और अन्य परीक्षा घोटालों के खिलाफ, जिन्होंने लाखों छात्रों के सपनों को तोड़ दिया।

यह आंदोलन जून के आखिर में शुरू हुआ। सोनम वांगचुक दिल्ली के जंतर-मंतर पर चल रहे विरोध प्रदर्शन में शामिल हुए। कॉकरोच जनता पार्टी – यह नाम दरअसल अदालत की एक टिप्पणी के बाद युवाओं ने अपने आंदोलन का प्रतीक बना लिया – लगातार जवाबदेही की मांग कर रही थी। उनकी मांग थी कि शिक्षा मंत्री जिम्मेदारी लें, परीक्षा प्रणाली में ऐसे सुधार किए जाएं कि भविष्य में ऐसी घटनाएं दोबारा न हों और उन छात्रों को न्याय मिले जिनका भविष्य इन घोटालों की वजह से प्रभावित हुआ। सोनम वांगचुक के लिए इस आंदोलन में शामिल होना कोई मजबूरी नहीं थी। 59 वर्ष की उम्र में वे पहले से ही लद्दाख के राज्य का दर्जा, छठी अनुसूची (Sixth Schedule) की सुरक्षा और वहां के पर्यावरण व संस्कृति को बचाने जैसी बड़ी लड़ाइयाँ लड़ रहे हैं। इसके बावजूद उन्होंने युवाओं के साथ खड़े होने का फैसला किया। उन्होंने कहा था कि जरूरत पड़ी तो छह सप्ताह या उससे भी अधिक समय तक अनशन करेंगे। इस दौरान उनका वजन लगभग 11 किलो से ज्यादा कम हो गया। वीडियो में उनकी आवाज़ हमेशा शांत रही, लेकिन उनके शरीर पर इस संघर्ष का असर साफ दिखाई दे रहा था।
हालात तब और गंभीर हो गए जब अनशन के लगभग 21वें दिन पुलिस उन्हें अस्पताल ले गई। उनकी टीम ने इसे जबरन अस्पताल ले जाना बताया, जबकि प्रशासन का कहना था कि यह उनकी बिगड़ती सेहत को देखते हुए किया गया। उनके समर्थक बेहद चिंतित थे। भारत ही नहीं, बल्कि लंदन जैसे कई देशों में रह रहे भारतीयों ने भी उनके समर्थन में प्रदर्शन किए। सोशल मीडिया पर उनके लिए दुआएं, समर्थन और गुस्से से भरे संदेश लगातार सामने आ रहे थे। मेदांता अस्पताल में डॉक्टर उनकी सेहत पर लगातार नजर रखे हुए थे। इसी दौरान सरकार और आंदोलनकारियों के बीच बातचीत भी शुरू हुई।
जब सोनम वांगचुक ने अपना अनशन समाप्त किया तो उन्होंने सभी समर्थकों का धन्यवाद किया, खासकर उन 65 सांसदों का जिन्होंने इस मुद्दे पर अपनी आवाज उठाई। सरकार की ओर से कथित तौर पर यह भरोसा दिया गया कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने वालों पर कोई कानूनी कार्रवाई नहीं होगी, परीक्षा सुधारों पर संसद में चर्चा होगी और प्रभावित परिवारों की सहायता के लिए कदम उठाए जाएंगे। वांगचुक ने अपने समर्थकों से शांति बनाए रखने की अपील करते हुए कहा, “फूल उठाइए, पत्थर नहीं।” यह बिल्कुल उनके व्यक्तित्व के अनुरूप था—दृढ़ लेकिन पूरी तरह शांतिपूर्ण। उन्होंने यह भी कहा कि जल्द ही एक वीडियो जारी कर पूरी जानकारी साझा करेंगे।
हालांकि आंदोलन यहीं समाप्त नहीं हुआ। कॉकरोच जनता पार्टी के कई सदस्य इस बात से खुश हैं कि सोनम वांगचुक सुरक्षित हैं, लेकिन वे तब तक अपना धरना जारी रखने की बात कह रहे हैं जब तक उन्हें ठोस बदलाव नहीं दिखाई देते। उनकी मांगों में शिक्षा मंत्री का इस्तीफा और पेपर लीक जैसी घटनाओं के खिलाफ सख्त कानून शामिल हैं। विपक्षी दल भी इस घटनाक्रम को अपने-अपने नजरिए से देख रहे हैं। कोई इसे आंशिक जीत बता रहा है तो कोई इसे केवल राजनीतिक प्रबंधन कह रहा है। लेकिन आम लोगों के लिए यह राहत की बात है कि सोनम वांगचुक सुरक्षित हैं और उनकी मांगों पर कम से कम बातचीत शुरू हुई है। हमारे देश में लाखों छात्र दिन-रात मेहनत करते हैं, माता-पिता अपनी पूरी जमा-पूंजी कोचिंग और पढ़ाई पर खर्च कर देते हैं, और जब ऐसे घोटाले सामने आते हैं तो उनके सपने टूट जाते हैं। यह सचमुच बेहद दुखद है।
सोनम वांगचुक की सबसे बड़ी खासियत यही है कि वे अलग-अलग मुद्दों को एक-दूसरे से जोड़कर देखते हैं। उनके लिए शिक्षा घोटाले और लद्दाख की लड़ाई अलग-अलग विषय नहीं हैं। दोनों का मूल उद्देश्य एक ही है—जमीन से जुड़े लोगों की आवाज़ सुनना, आने वाली पीढ़ियों का भविष्य सुरक्षित करना और यह सुनिश्चित करना कि बड़ी व्यवस्थाएं छोटे और आम लोगों को कुचल न दें। उन्होंने आइस स्तूप बनाए, सोलर स्कूलों को बढ़ावा दिया, जलवायु परिवर्तन पर लगातार काम किया और हमेशा लोगों को केवल बातें नहीं बल्कि समाधान देना सिखाया। वर्षों से दिए गए उनके इंटरव्यू यही बताते हैं कि वे एक ऐसे शिक्षक हैं जो भाषणों से ज्यादा काम पर भरोसा करते हैं।
उनकी पत्नी और परिवार के लिए यह समय बेहद कठिन रहा होगा। 26 दिनों तक लगातार अनशन करना कोई आसान बात नहीं होती। कमजोरी, स्वास्थ्य संबंधी खतरे और हर पल डॉक्टरों की निगरानी—इन सबके बावजूद उन्होंने अपना संकल्प नहीं छोड़ा। जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी उनके शीघ्र स्वस्थ होने की कामना की, तो इस पूरे आंदोलन को एक अलग ही राष्ट्रीय महत्व मिला। इससे यह भी स्पष्ट हुआ कि इस मामले ने पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींचा।
अब जब सोनम वांगचुक धीरे-धीरे स्वस्थ हो रहे हैं और सामान्य भोजन की ओर लौट रहे हैं, तो सबसे बड़ा सवाल यही है कि आगे क्या होगा? क्या संसद वास्तव में परीक्षा सुधारों पर गंभीर चर्चा करेगी? क्या लद्दाख से जुड़े मुद्दों को वह महत्व मिलेगा जिसके वे हकदार हैं? क्या अगली परीक्षा से पहले छात्रों को एक बेहतर और सुरक्षित व्यवस्था देखने को मिलेगी? इन सवालों के जवाब अभी भविष्य के गर्भ में हैं, लेकिन वरिष्ठ केंद्रीय मंत्रियों की मौजूदगी में उनका अनशन समाप्त होना इस बात का संकेत जरूर है कि संवाद का एक रास्ता खुला है।
ऐसे पल हमें याद दिलाते हैं कि बदलाव के लिए धैर्य और त्याग कितना जरूरी होता है। हर व्यक्ति 26 दिन तक भूखा रहकर संघर्ष नहीं कर सकता। हममें से ज्यादातर लोग सिर्फ सोशल मीडिया पर पोस्ट शेयर करते हैं। लेकिन सोनम वांगचुक ने दिखाया कि वास्तविक बदलाव के लिए कभी-कभी व्यक्तिगत बलिदान देना पड़ता है। उन्होंने पहले खुद को मजाकिया अंदाज में “मानद कॉकरोच” भी कहा था, ताकि युवाओं के साथ अपनी एकजुटता दिखा सकें। उनकी यही विनम्रता लोगों का सम्मान जीतती है।

हर उस छात्र के लिए जो अपनी परीक्षाओं को लेकर चिंतित है, हर उस माता-पिता के लिए जो अपने बच्चों के भविष्य की फिक्र करता है, और हर उस लद्दाखी के लिए जो अपनी जमीन और अपनी पहचान की रक्षा की लड़ाई लड़ रहा है—यह दिन उम्मीद का दिन है।
जल्दी स्वस्थ होइए, सोनम सर। संघर्ष अभी जारी है, लेकिन आज इस बात की खुशी जरूर है कि आप हमारे बीच हैं और अब भी बदलाव की राह पर डटे हुए हैं।
स्रोत:
- Moneycontrol, BBC, The Quint, Hindustan Times और 23–24 जुलाई 2026 की लाइव रिपोर्ट्स।
- X (पूर्व में Twitter) और अन्य प्रमुख समाचार माध्यमों की रिपोर्ट्स, जिनमें मेदांता अस्पताल की घटनाएं और CJP आंदोलन की पृष्ठभूमि शामिल है।