‘कॉकरोचों से ठसाठस भरा’: CJP प्रदर्शन के 25वें दिन जब कुणाल कामरा और चंद्रशेखर आज़ाद पहुंचे आंदोलन में

यह कोई चमक-दमक वाला बड़ा कार्यक्रम नहीं था। यहां न स्टेज था, न कैमरों की भीड़। यहां थे थके हुए चेहरे, धूप में तपते छात्र, दर्द, गुस्सा और बदलाव की उम्मीद। कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के प्रदर्शन के 25वें दिन कॉमेडियन कुणाल कामरा और भीम आर्मी प्रमुख चंद्रशेखर आज़ाद आंदोलन स्थल पर पहुंचे और छात्रों व सामाजिक कार्यकर्ताओं के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े हुए। उनके पहुंचते ही पूरे प्रदर्शन में एक नई ऊर्जा दिखाई दी। “कॉकरोचों से ठसाठस भरा” वाला नारा अब उनके लिए एक पहचान बन चुका है। उनका संदेश साफ है—”चाहे हमें जो भी कह लो, जब तक बदलाव नहीं होगा, हम यहां से नहीं हटेंगे।”

यह पूरा आंदोलन NEET परीक्षा विवाद को लेकर है—पेपर लीक, विवादित ग्रेस मार्क्स और ऐसे नतीजे जिन्होंने लाखों छात्रों का भविष्य सवालों के घेरे में ला दिया। जिन बच्चों ने दिन-रात मेहनत की, अपनी किशोरावस्था पढ़ाई में लगा दी, उनके सपने एक झटके में टूट गए। कुछ छात्र इस सदमे को सहन नहीं कर पाए और उन्होंने आत्महत्या तक कर ली। माता-पिता आज भी गहरे सदमे में हैं। इसी वजह से अभिजीत डिपके के नेतृत्व में CJP के कार्यकर्ता पिछले तीन हफ्तों से अधिक समय से धरने पर बैठे हैं। उनकी मांग है कि केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान इस्तीफा दें और प्रभावित परिवारों को उचित मुआवजा दिया जाए। उनके लिए यह राजनीति नहीं, बल्कि व्यक्तिगत दर्द और न्याय की लड़ाई है।

कुणाल कामरा एक साधारण गांधी टी-शर्ट पहनकर प्रदर्शन स्थल पहुंचे। इस बार मंच पर व्यंग्य या हास्य नहीं था। उन्होंने भीड़ के बीच खड़े होकर छात्रों की आवाज़ का समर्थन किया। ऐसा महसूस हो रहा था मानो वे कहना चाहते हों—”ये बच्चे इतनी मेहनत करते हैं और सिस्टम उनके सपने छीन लेता है।” सत्ता पर अपने तीखे व्यंग्य के लिए पहचाने जाने वाले कामरा का इस तरह सड़क पर उतरना लोगों को दिखा गया कि यह सिर्फ सोशल मीडिया की प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि एक वास्तविक समर्थन है। उनकी मौजूदगी ने वहां मौजूद छात्रों और प्रदर्शनकारियों का मनोबल बढ़ा दिया। ऐसे छोटे-छोटे पल ही लंबे आंदोलनों को जीवित रखते हैं।

कुणाल कामरा और चंद्रशेखर आज़ाद CJP प्रदर्शन में पहुंचे, NEET छात्रों का आंदोलन 25वें दिन तेज

इसी दौरान चंद्रशेखर आज़ाद ने लद्दाख के सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक से मुलाकात की, जो पिछले 18 दिनों से आमरण अनशन पर हैं। लगातार उपवास के कारण उनका वजन करीब 9 किलो कम हो चुका है। उनका रक्तचाप भी काफी नीचे आ गया है और डॉक्टर लगातार उनकी निगरानी कर रहे हैं। लेकिन उनकी आंखों में अब भी वही दृढ़ संकल्प दिखाई देता है। आज़ाद की मौजूदगी से पूरे आंदोलन में नई ऊर्जा आई। अभिजीत डिपके ने सार्वजनिक रूप से उनका धन्यवाद करते हुए कहा कि 25 दिनों से संघर्ष कर रहे छात्रों का हौसला इससे काफी बढ़ा है। ये नेता सिर्फ बयान देने नहीं आए, बल्कि उन्हीं लोगों के बीच बैठे जिन्होंने कई दिनों से जमीन पर सोकर और सीमित संसाधनों में आंदोलन जारी रखा है। यही मानवीय जुड़ाव सबसे ज्यादा मायने रखता है।

CJP Protest Day 25: कुणाल कामरा और चंद्रशेखर आज़ाद ने बढ़ाया छात्रों का हौसला

सोनम वांगचुक की स्थिति बेहद भावुक कर देने वाली है। उन्होंने निष्पक्ष परीक्षाओं और बेहतर शिक्षा व्यवस्था की मांग को लेकर यह अनशन शुरू किया। इसमें कोई राजनीतिक नाटक नहीं, बल्कि एक शांत और गंभीर त्याग दिखाई देता है। फिल्म जगत से उनके करीबी लोग—शबाना आज़मी, सोनी राजदान और अनुराग कश्यप—लगातार उनसे अनशन समाप्त करने की अपील कर रहे हैं। शबाना आज़मी ने कहा, “हमें आपकी जरूरत लंबे समय तक है, इसलिए आपको जीवित रहना चाहिए।” वहीं अनुराग कश्यप ने सरकार की चुप्पी पर सवाल उठाते हुए कहा कि यह डरावना है कि जैसे किसी को उनकी जान की परवाह ही नहीं। जीनत अमान समेत कई अन्य कलाकारों ने भी यही चिंता जताई। किसी सम्मानित व्यक्ति को अपने स्वास्थ्य की कीमत पर संघर्ष करते देखना बेहद कठिन है, लेकिन यही त्याग इस आंदोलन को और मजबूत बनाता है।

कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने भी एक भावुक खुला पत्र लिखा। उन्होंने अपने मध्यमवर्गीय परिवार के दिनों को याद करते हुए कहा कि उनके परिवार में एक ईमानदार परीक्षा का परिणाम ही भविष्य तय करता था। उन्होंने लिखा, “हमारे लिए मेरिट कोई नारा नहीं था, बल्कि आगे बढ़ने का एकमात्र रास्ता था।” यह बात देश के करोड़ों परिवारों की हकीकत को सामने लाती है। एक पेपर लीक, एक गलत परीक्षा या एक विवादित परिणाम वर्षों की मेहनत को खत्म कर सकता है। यहां सिर्फ अंक नहीं, बल्कि सपने, परिवार की उम्मीदें और भविष्य दांव पर लगे होते हैं।

कल सोनम वांगचुक के समर्थन में एक दिवसीय सामूहिक भूख हड़ताल का आह्वान किया गया है। वहीं 20 जुलाई को संसद सत्र शुरू होने के साथ “चलो संसद” मार्च आयोजित करने की तैयारी है। आयोजक मिस्ड कॉल अभियान के जरिए अधिक से अधिक लोगों को जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं। धीरे-धीरे इस आंदोलन को छात्रों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और विपक्षी नेताओं का समर्थन भी मिलता जा रहा है। बृंदा करात सहित कई अन्य नेता भी धरना स्थल पर पहुंच चुके हैं। यह आंदोलन अब आम भारतीयों की आवाज़ बनता दिख रहा है, जो कह रहे हैं—”अब बहुत हो चुका, शिक्षा व्यवस्था को ठीक कीजिए।”

धरना स्थल पर गुस्से से भरे पोस्टर, नारे लगाते युवा, अपनी आवाज़ खोते छात्र और प्रदर्शनकारियों के बीच खाना बांटते परिवार—यह पूरा दृश्य बेहद भावुक है। “कॉकरोच” शब्द शायद शुरुआत में अपमान के लिए इस्तेमाल किया गया था, लेकिन आंदोलनकारियों ने इसे अपनी ताकत का प्रतीक बना दिया है—छोटे हैं, लेकिन लगातार मौजूद हैं और उन्हें अनदेखा करना आसान नहीं। कहीं कुणाल कामरा छात्रों के बीच मुस्कुराते दिखाई देते हैं, कहीं चंद्रशेखर आज़ाद सामाजिक न्याय की बात करते हैं और दूसरी ओर सोनम वांगचुक चुपचाप अपने अनशन पर डटे रहते हैं। यह दृश्य अव्यवस्थित जरूर है, लेकिन पूरी तरह भारतीय समाज की वास्तविक तस्वीर पेश करता है।

CJP प्रदर्शन के 25वें दिन कुणाल कामरा और चंद्रशेखर आज़ाद छात्रों के समर्थन में पहुंचे। NEET परीक्षा विवाद, सोनम वांगचुक के अनशन और छात्रों की मांगों से जुड़ी पूरी खबर पढ़ें।

कुछ लोग इसे राजनीतिक ड्रामा कह सकते हैं और शायद कुछ हिस्सों में राजनीति भी हो। लेकिन अगर शोर से हटकर देखा जाए तो इस आंदोलन की असली लड़ाई उन छात्रों के लिए है जिन्हें निष्पक्ष अवसर मिलना चाहिए था। परीक्षाएं किसी लॉटरी की तरह नहीं होनी चाहिए, जहां मेहनत से ज्यादा किस्मत या भ्रष्टाचार तय करे कि कौन सफल होगा। छात्रों का मानसिक स्वास्थ्य, प्रश्नपत्रों की सुरक्षा और पारदर्शी परीक्षा प्रणाली कोई असंभव मांग नहीं है। सरकार यदि खुलकर संवाद करे, निष्पक्ष जांच कराए और युवाओं को भरोसा दिलाए, तो हालात काफी बेहतर हो सकते हैं। लेकिन लगातार बनी हुई चुप्पी सिर्फ असंतोष को बढ़ा रही है।

प्रदर्शन के दौरान कुणाल कामरा की तीखी टिप्पणी सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुई क्योंकि उसने वही भावना व्यक्त की जिसे देश के लाखों युवा महसूस कर रहे हैं। वहीं चंद्रशेखर आज़ाद का सोनम वांगचुक से मिलना इस बात का प्रतीक बन गया कि अलग-अलग मुद्दों पर लड़ने वाले लोग भी न्याय की एक साझा लड़ाई में साथ खड़े हो सकते हैं। यह सिर्फ एक परीक्षा का मुद्दा नहीं, बल्कि इस बात का सवाल है कि देश अपने युवाओं, खासकर छोटे शहरों और कमजोर वर्गों से आने वाले छात्रों के साथ कैसा व्यवहार करता है।

प्रदर्शन का 25वां दिन अंत नहीं, बल्कि एक नए अध्याय की शुरुआत जैसा महसूस हुआ। आने वाले दिनों में और लोग जुड़ेंगे, दबाव बढ़ेगा और उम्मीद है कि इसका परिणाम सिर्फ तस्वीरों और आश्वासनों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि शिक्षा व्यवस्था में वास्तविक सुधार के रूप में सामने आएगा। इस देश के लाखों बच्चे छोटी-छोटी जगहों और सीमित संसाधनों में बैठकर बड़े सपने देखते हैं। उन्हें पेपर लीक, घोटालों और सरकारी चुप्पी का सामना नहीं करना चाहिए।

अगर आप दिल्ली में हैं, तो एक बार वहां जाकर प्रदर्शनकारियों से मिलिए। उनके साथ एक कप चाय पीजिए और उनकी कहानी सुनिए। क्योंकि जब शिक्षा व्यवस्था इतनी गहरी चोट पहुंचाती है, तो उसका दर्द सिर्फ छात्रों तक सीमित नहीं रहता—पूरा देश उसे महसूस करता है।

स्रोत:

  • टाइम्स ऑफ इंडिया की 15 जुलाई 2026 की रिपोर्ट (Day 25 Protest)
  • हिंदुस्तान टाइम्स, फ्री प्रेस जर्नल और सोशल मीडिया पर मौजूद प्रत्यक्ष अपडेट्स

@रोहित मनराल

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Scroll to Top