दिल्ली में ढही इमारत: 50 साल पुरानी इमारत को लालच ने फिर जिंदा किया

सत्या निकेतन बिल्डिंग हादसा

दरारों से भरी दीवारें, ऐसी नमी जो सूखने का नाम न ले और ऐसे खंभे, जिन्हें देखकर लगता हो कि वे मजबूती से नहीं बल्कि सिर्फ आदत के सहारे खड़े हैं। सत्या निकेतन की यह इमारत बिल्कुल ऐसी ही थी। करीब 50 साल पुरानी। उस समय बनी थी जब यह इलाका आम परिवारों की पुनर्वास कॉलोनी हुआ करता था, आज की तरह छात्रों से भरा-पूरा इलाका नहीं। दिल्ली यूनिवर्सिटी के साउथ कैंपस के पास वर्षों तक यह इमारत चुपचाप बूढ़ी होती रही। फिर लालच आया और उसने तय किया कि इस पुराने ढांचे से अभी और पैसा कमाया जा सकता है।

रविवार दोपहर, 6 सितंबर 2026 को करीब साढ़े एक बजे, पांच मंजिला इमारत, जिसे Hostel Daze के नाम से जाना जाता था, अचानक जवाब दे गई। पड़ोसियों के मुताबिक इमारत के गिरने की आवाज ऐसी थी, जैसे अचानक कोई तेज कंपन हुआ हो। अंदर छात्र मौजूद थे। कुछ छात्र रविवार होने के कारण सो रहे थे। नीचे मजदूर काम कर रहे थे। कुछ ही मिनटों में पूरी इमारत कंक्रीट और मुड़ी-तुड़ी लोहे की छड़ों के मलबे में बदल गई।

कम से कम पांच लोगों की मौत हो गई। कई अन्य लोगों को घायल अवस्था में बाहर निकाला गया। NDRF, दमकल विभाग, पुलिस और आपदा प्रबंधन की टीमें घंटों तक मलबे में तलाश करती रहीं। बाहर दोस्तों और सहपाठियों की भीड़ इंतजार करती रही। कुछ लोगों को अभी भी उन छात्रों के फोन आ रहे थे, जो मलबे के नीचे फंसे हुए थे।

इमारत में एक बेसमेंट और उसके ऊपर पांच मंजिलें थीं। इसे लड़कों के लिए पेइंग गेस्ट (PG) आवास के रूप में चलाया जा रहा था। इसमें करीब 75 बेड थे और कमरे छात्रों से भरे हुए थे। किराया लगभग 12,000 से 15,000 रुपये प्रति छात्र प्रति माह था। ग्राउंड फ्लोर पर मेस और एक मेडिकल शॉप थी। ऊपर की मंजिलों पर केरल, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और दूसरे इलाकों से आए युवा रहते थे। इनमें Motilal Nehru, ARSD, Sri Venkateswara और आसपास के दूसरे कॉलेजों में पढ़ने वाले छात्र शामिल थे।

इनमें से कई छात्रों के लिए कॉलेज के पास रहने का यह सबसे किफायती विकल्प था।

पूरा सत्या निकेतन अब एक तरह से PG के जंगल में बदल चुका है। पुराने एकल परिवारों के लिए बने मकान नियमों की ज्यादा परवाह किए बिना ऊपर और आसपास की तरफ फैलते चले गए। कई मालिक अब गुरुग्राम या दूसरी जगहों पर रहते हैं और किराया ऑनलाइन हासिल करते रहते हैं।

इस खास इमारत को खत्म करने वाला काम बेसमेंट में चल रहा था।

स्थानीय लोगों और शुरुआती रिपोर्टों के मुताबिक हाल की बारिश के बाद बेसमेंट में पानी जमा हो रहा था। नींव पहले से कमजोर थी। इसके बावजूद वहां renovation का काम जारी था। कुछ लोगों का कहना है कि ज्यादा जगह इस्तेमाल करने या पानी जमा होने की समस्या दूर करने के लिए काम किया जा रहा था। वहीं कुछ लोगों के मुताबिक एक दीवार हटाई जा रही थी और खंभों के साथ छेड़छाड़ की जा रही थी, जबकि ऊपर की मंजिलों पर छात्र रह रहे थे।

मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने कहा कि शुरुआती जानकारी से संकेत मिलता है कि बेसमेंट में की गई खुदाई के कारण एक खंभा खिसक गया था।

ऊपरी हिस्से में शायद कुछ मजबूती बढ़ाई गई थी, लेकिन नीचे का आधार पुराना और कमजोर था। जब आप ऐसी इमारत के नीचे खुदाई करते हैं, जिसे कभी पांच मंजिलों पर छात्रों और उनके सामान का भार उठाने के लिए बनाया ही नहीं गया था, तो आखिरकार कुछ न कुछ जवाब देता है।

रिपोर्टों में मालिक का नाम हरिराम या हरि राम बंसल बताया गया है। संपत्ति के संबंध में उनके परिवार के सदस्यों, जिनमें आनंद बंसल का नाम भी शामिल है, का जिक्र किया गया है। बताया जाता है कि वह इन दिनों गुरुग्राम में रहते हैं।

पुलिस ने उनके और अन्य लोगों के खिलाफ FIR दर्ज की है। इसमें गैर-इरादतन हत्या, लापरवाही से निर्माण और लोगों की जान खतरे में डालने से जुड़ी धाराएं शामिल हैं। पुलिस टीमें उनकी तलाश कर रही हैं।

बताया गया है कि इमारत की हालत को देखते हुए उसे एक समय खाली भी कराया गया था। इसके बावजूद बाद में इसे फिर PG के तौर पर इस्तेमाल में लाया गया।

Fire NOC नहीं था। प्लॉट के लिए तय सीमा से ज्यादा ऊंचाई थी। वर्षों के दौरान अतिरिक्त मंजिलें जोड़ी गईं। शुरुआत में यह बहुत छोटी संरचना थी, लेकिन धीरे-धीरे इसमें मंजिलें बढ़ती गईं।

कहानी वही पुरानी है।

यह कोई असाधारण हादसा नहीं है। कुछ साल पहले सत्या निकेतन में ही renovation के दौरान एक इमारत का हिस्सा गिरा था, जिसमें मजदूरों की मौत हुई थी।

पूरे दिल्ली में एक ही पैटर्न बार-बार दिखाई देता है—पुरानी इमारतें, अवैध निर्माण, अतिरिक्त मंजिलें, पानी का रिसाव, बारिश और मालिकों द्वारा हर आखिरी रुपये तक कमाने की कोशिश, जब तक कि ढांचा उसे सहना बंद न कर दे।

Civic agencies को शिकायतें मिलती हैं। कभी निरीक्षण होता है। कभी violations के मामले दर्ज होते हैं। लेकिन वास्तविक कार्रवाई अक्सर तब होती है जब मलबा सड़क पर आ चुका होता है।

यहां के निवासी खुले नालों, लगातार होने वाले जलभराव और ढलान वाली गलियों की बात करते हैं। छोटी-छोटी जमीनों पर पांच या छह मंजिल तक इमारतें खड़ी हो गई हैं, जबकि ये प्लॉट कभी इतनी ऊंची इमारतों के लिए बनाए ही नहीं गए थे।

मालिक इन इमारतों को निवेश की तरह देखते हैं।

छात्र इन्हें अस्थायी छत की तरह देखते हैं।

लेकिन कोई इन्हें ऐसी जगह की तरह नहीं देखता, जिसकी नियमित structural safety जांच होनी चाहिए।

जरा उन युवाओं के बारे में सोचिए, जो उस इमारत में रहते थे।

कई छात्र शायद घर से वापस लौटे थे। कुछ सप्ताहांत होने के कारण वहीं रुके हुए थे। माता-पिता ने यह सोचकर किराया भेजा था कि उनका बच्चा कॉलेज के पास सुरक्षित रहेगा।

लेकिन कुछ अब अस्पताल में हैं।

कुछ वापस नहीं लौटेंगे।

आसपास के कॉलेजों ने विस्थापित छात्रों के लिए अपने गेट खोल दिए ताकि वे उस रात कैंपस में सो सकें। दोस्तों ने राहत और बचाव कार्य में मदद करने के लिए मानव श्रृंखला बनाई। इसके बाद हमेशा की तरह राजनीतिक बयान आए। जांच के आदेश दिए गए। सख्त कार्रवाई के वादे किए गए।

हम यह सब पहले भी सुन चुके हैं।

असल समस्या बिल्कुल सामने है।

करीब 50 साल पुरानी एक ऐसी इमारत, जो पहले से ही मर रही थी, उसे छात्रों से मिलने वाले लगातार किराये की उम्मीद ने जिंदा रखा।

बेसमेंट में काम जारी रहा, जबकि नींव कमजोर हो चुकी थी।

पानी जमा होने दिया गया।

अतिरिक्त मंजिलें बनी रहीं।

नियम कागजों पर मौजूद रहे।

प्रवर्तन कमजोर रहा।

और जब इमारत आखिरकार गिर गई, तो हर कोई हैरान रह गया।

लेकिन ऐसी इमारतें अचानक नहीं गिरतीं।

उन्हें गिरने की तरफ धकेला जाता है।

लालच लगातार वजन बढ़ाता रहता है, जब तक कि पुरानी इमारत की हड्डियां उस भार को उठाने से इनकार न कर दें।

और जब तक अगली इमारत नहीं गिरती, यही चक्र चलता रहता है—

एक और पुराना ढांचा।

छात्रों का एक और समूह।

एक और बचाव अभियान।

एक और FIR।

एक और जांच।

इन गलियों में रहने और पढ़ने वाले लोग सच्चाई पहले से जानते हैं।

बाकी दुनिया को बस तब दिखाई देता है, जब मलबे से उठती धूल नजर आती है।

Sources:

  • Delhi Police statements & FIR details (ANI, PTI)
  • Chief Minister Rekha Gupta’s on-site remarks
  • The Print, Times of India, India Today, The Statesman, News18, Tribune reports (6 Sept 2026)
  • Local eyewitness & resident accounts carried by above outlets
  • AIIMS Trauma Centre updates on casualties

@रोहित मनराल

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