
4 सितंबर को श्रीहरिकोटा से EOS-05 अर्थ ऑब्जर्वेशन सैटेलाइट को लेकर GSLV-F17 के सफल प्रक्षेपण के कुछ ही घंटों बाद ISRO चेयरमैन वी. नारायणन के सामने एक अहम पत्र पहुंचा। संगठन के प्रमुख केंद्रों में काम करने वाले हजारों कर्मचारियों का प्रतिनिधित्व करने वाली नौ कर्मचारी associations ने संयुक्त रूप से अपनी चिंताएं लिखित रूप में सामने रखीं। उन्होंने सरकार की ओर से अंतरिक्ष क्षेत्र को निजी कंपनियों के लिए खोलने की प्रक्रिया की दिशा और इसमें ISRO के कर्मचारियों के भविष्य को लेकर स्पष्ट जवाब मांगा।
इन नौ associations में ISRO Staff Association, SHAR Employees Association, ISAC Employees Association, ISRO Staff Association-LPSC, ISRO Staff Association-BBU, NRSA Employees Union, Space Employees Association-BBU, ISRO Staff Association-IPRC और SAC Employees Welfare Association शामिल हैं। ये संगठन मिलकर करीब 5,000 कर्मचारियों का प्रतिनिधित्व करते हैं, जो ISRO की लगभग 18,100 की कुल workforce का करीब एक-चौथाई है। 4 सितंबर को दिया गया पांच पन्नों का यह representation पिछले छह वर्षों में अंतरिक्ष क्षेत्र को निजी भागीदारी के लिए खोले जाने के बाद इस तरह की पहली औपचारिक संयुक्त पहल है।
Pawan Goenka के बयान के बाद उठे सवाल
कर्मचारियों की इस चिट्ठी की तत्काल वजह IN-SPACe के चेयरमैन Pawan Goenka की एक सार्वजनिक टिप्पणी बनी। उन्होंने कहा था कि आने वाले समय में ISRO launch vehicles का निर्माण नहीं करेगा और यह काम private sector या public sector undertakings को सौंपा जाएगा।
कर्मचारी associations ने कहा कि Goenka की टिप्पणी को व्यापक स्तर पर रिपोर्ट किया गया, लेकिन Department of Space की ओर से इस बारे में कोई आधिकारिक communication सामने नहीं आया। कर्मचारियों का कहना है कि उन्हें अब तक यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि इस नीति का आधिकारिक स्वरूप क्या है, इसका कानूनी आधार क्या है, इसकी timeline क्या होगी और वर्षों से ISRO में काम कर रहे कर्मचारियों पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा।
हालांकि, associations ने यह स्पष्ट किया है कि वे अंतरिक्ष क्षेत्र में private companies की entry के खिलाफ नहीं हैं। उनका कहना है कि defined commercial activities में private participation एक मजबूत और publicly owned ISRO के साथ coexist कर सकती है।
उनकी मुख्य चिंता उस स्थिति को लेकर है जिसमें ISRO को केवल एक सीमित R&D organisation तक सीमित कर दिया जाए और देश के launch vehicles के वास्तविक निर्माण तथा launch infrastructure का संचालन धीरे-धीरे public sector से बाहर चला जाए।
कर्मचारियों को नौकरी, प्रमोशन और कौशल विकास की चिंता
कर्मचारियों की चिंता केवल नीति तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा असर उनके करियर पर भी पड़ सकता है। उनका मानना है कि अगर PSLV, LVM-3 और SSLV जैसे launch vehicles का manufacturing और operational work धीरे-धीरे ISRO से बाहर चला गया तो organisation के भीतर उपलब्ध काम कम हो सकता है।
इसका असर promotions और skill-development opportunities पर पड़ने की आशंका भी जताई गई है। कर्मचारियों को डर है कि मौजूदा staff के लिए meaningful roles कम हो सकते हैं, जबकि private contractors को ऐसी technology का इस्तेमाल करने का अवसर मिलेगा जिसे दशकों के दौरान public money और ISRO कर्मचारियों के प्रयासों से विकसित किया गया है।
Regular recruitment को लेकर भी चिंता है। पहले से मौजूद vacancies और recruitment में धीमी गति के बीच associations को आशंका है कि आने वाले समय में recruitment और कम हो सकती है। इससे युवा engineers और scientists के लिए ISRO में career opportunities भी प्रभावित हो सकती हैं।
SSLV से लेकर PSLV और LVM-3 तक बदलाव की चिंता
Associations ने कहा है कि यह बदलाव कुछ क्षेत्रों में पहले ही दिखाई देने लगा है। SSLV से जुड़ी technology और production rights Hindustan Aeronautics Limited को दिए जा चुके हैं। Reports में यह भी सामने आया है कि इसी तरह के कदम PSLV और LVM-3 तक बढ़ सकते हैं।
Routine satellite manufacturing के काम को भी बाहर ले जाने की बात कही जा रही है। इसके अलावा Kulasekarapattinam में नए launch infrastructure समेत कई सुविधाओं को private players के लिए खोला जा रहा है।
ISRO से करीब 120 technologies private sector को transfer की जा चुकी हैं। कर्मचारी associations अब यह जानना चाहते हैं कि taxpayer funds और कई पीढ़ियों के कर्मचारियों की मेहनत से तैयार इन public assets को transfer करने की institutional व्यवस्था क्या है और इस पूरी प्रक्रिया में NSIL और IN-SPACe की वास्तविक भूमिका क्या है।
कर्मचारियों ने सरकार से पूछे कई सीधे सवाल
कर्मचारी associations ने अपने representation में कई specific सवाल उठाए हैं।
वे जानना चाहते हैं कि क्या Pawan Goenka का बयान सरकार, Space Commission या Department of Space के किसी approved decision को दर्शाता है। अगर ऐसा है तो वे उस decision की तारीख, संबंधित authority और उसका official text चाहते हैं।
उन्होंने यह भी पूछा है कि क्या मौजूदा और भविष्य के launch vehicles का design, development, realisation, integration, testing और launch ISRO के कार्यों में बने रहेंगे।
इसके अलावा associations ने सवाल किया है कि क्या कुछ technology transfers में public sector undertakings को जानबूझकर बाहर रखा गया है और अगर ऐसा किया गया है तो इसकी वजह क्या है।
कर्मचारियों ने अगले पांच से दस वर्षों में sanctioned strength, vacancies और recruitment calendar को लेकर भी स्पष्टता मांगी है। साथ ही serving employees को adverse cadre reviews या promotional avenues में कमी से बचाने के लिए मौजूद safeguards के बारे में भी जवाब मांगा गया है।
ISRO की सफलता के बीच उठा बड़ा संस्थागत सवाल
यह पत्र ऐसे समय आया है जब ISRO एक बार फिर देशभर में चर्चा में है। GSLV-F17 की सफलता ने कई महीनों के अंतराल के बाद संगठन की launch capabilities को एक बार फिर सामने रखा है।
दूसरी ओर, 2020 के बाद से सरकार की broader space policy की दिशा भी स्पष्ट रही है। अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था का विस्तार करने के लिए private industry की भागीदारी बढ़ाने पर जोर दिया गया है, ताकि ISRO advanced research और strategic missions पर ज्यादा ध्यान दे सके।
सरकार ने startups को mentor करने और कुछ operational activities को private sector की ओर transfer करने की बात कही है। लेकिन ISRO के भीतर कई कर्मचारियों के लिए सबसे बड़ा सवाल एक transparent roadmap का है, जिसमें दशकों में विकसित institutional knowledge की सुरक्षा हो और workforce को केवल एक residual cost के रूप में न देखा जाए।
Jairam Ramesh ने कर्मचारियों के कदम को बताया सराहनीय
Congress leader Jairam Ramesh ने कर्मचारियों की इस पहल को “courageous and commendable” बताया। उन्होंने सरकार पर ISRO की भूमिका को जानबूझकर सीमित करने और ऐसी capabilities transfer करने का आरोप लगाया, जिनके लिए private sector की long-term commitment को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है।
हालांकि, कर्मचारी associations ने अपने पत्र का tone measured रखा है। उनका मुख्य उद्देश्य टकराव नहीं बल्कि written clarity हासिल करना है। वे चाहते हैं कि ISRO चेयरमैन वी. नारायणन, जो Department of Space के Secretary और Space Commission के Chairman भी हैं, इस पूरे मुद्दे पर स्पष्ट जवाब दें।
ISRO के कर्मचारियों के लिए मुद्दा सिर्फ नीति नहीं, भविष्य का है
Vikram Sarabhai Space Centre, Satish Dhawan Space Centre, U R Rao Satellite Centre और ISRO के दूसरे केंद्रों में काम करने वाले हजारों कर्मचारियों के लिए यह केवल एक policy debate नहीं है।
यह सवाल उनके काम और भविष्य से जुड़ा है। वर्षों से जिन लोगों ने भारतीय satellites को अंतरिक्ष में पहुंचाने वाले rockets के निर्माण की विशेषज्ञता हासिल की है, उनके लिए अहम सवाल यह है कि क्या यह काम आगे भी ISRO के भीतर जारी रहेगा या धीरे-धीरे organisation से बाहर चला जाएगा।
कर्मचारी associations ने अपने पत्र के जरिए यही स्पष्टता मांगी है कि क्या देश के launch vehicles को बनाने और launch infrastructure को संचालित करने का काम ISRO के हाथों में रहेगा, या आने वाले वर्षों में इसका बड़ा हिस्सा private sector की ओर चला जाएगा।
उनकी मांग है कि irreversible decisions लिए जाने से पहले कर्मचारियों को स्पष्ट roadmap और लिखित जवाब दिया जाए। फिलहाल, इन सवालों के जवाब का इंतजार है।
Sources: Times of India, The Indian Express, Hindustan Times, Deccan Herald, India Today, The Week, Times Now, Mathrubhumi English, News18, The Federal, ANI.
@रोहित मनराल