GDP Growth 7.8% या 2.5%? सुरजीत भल्ला, मोंटेक सिंह अहलूवालिया ने साफ किया विवाद

GDP Growth 7.8% या 2.5%

GDP के ये आंकड़े सामने आते ही अचानक हर तरफ शोर शुरू हो जाता है। एक तरफ पहली तिमाही में 7.8 प्रतिशत की ग्रोथ को लेकर जश्न मनाया जा रहा है, तो दूसरी तरफ कुछ लोग ऐसे दस्तावेज और गणनाएं सामने रख रहे हैं जिनमें कहा जा रहा है कि अगर संशोधित आंकड़ों को गहराई से देखा जाए तो असल तस्वीर करीब 2.5 प्रतिशत की हो सकती है।

इस पूरे विवाद की शुरुआत पूर्व वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग की टिप्पणी से हुई। उन्होंने बताया कि पिछले साल की पहली तिमाही का GDP आंकड़ा करीब 86 लाख करोड़ रुपये से घटाकर लगभग 80 लाख करोड़ रुपये कर दिया गया। उनके मुताबिक, अगर इस निचले बेस को इस्तेमाल किया जाए तो GDP growth काफी ज्यादा दिखाई देती है। उनका कहना था कि इस बदलाव के बिना nominal growth 2.5 प्रतिशत से भी कम रहती।

इसके बाद कांग्रेस ने भी इस मुद्दे को उठाया और GDP की पूरी methodology, deflator और नई 2022-23 base series पर सवाल खड़े किए। सरकार की तरफ से जवाब आया कि पुरानी series और नई series को आपस में मिलाकर तुलना नहीं की जा सकती।

इसी बहस को समझने के लिए राजदीप सरदेसाई ने कुछ ऐसे लोगों को चर्चा में शामिल किया जो इस विषय को करीब से समझते हैं—सुरजीत भल्ला, मोंटेक सिंह अहलूवालिया और नीलकंठ मिश्रा। उन्होंने मिलकर आंकड़ों के पीछे की पूरी कहानी समझाने की कोशिश की।

और चर्चा से एक बात काफी साफ निकलकर आई—इनमें से किसी को भी ऐसा कोई सबूत नहीं मिला कि GDP के आंकड़ों में राजनीतिक कारणों से हेरफेर किया गया हो।

सुरजीत भल्ला ने क्या कहा?

सुरजीत भल्ला ने इस मुद्दे पर सीधी बात रखी। उन्होंने कहा कि उन्होंने खुद यह देखने की कोशिश की कि कहीं GDP revisions को growth rate को बढ़ाकर दिखाने के लिए तो इस्तेमाल नहीं किया गया।

उनका निष्कर्ष था कि “आज तक ऐसा कोई सबूत नहीं है कि हमने आंकड़ों के साथ राजनीति की है।”

जब उनसे सीधे पूछा गया कि क्या GDP में downward revision के पीछे कोई राजनीतिक प्रभाव हो सकता है, तो उनका जवाब बिल्कुल स्पष्ट था—“Absolutely no politics.”

भल्ला ने एक महत्वपूर्ण सवाल भी उठाया। अगर सरकार GDP के आंकड़ों को जानबूझकर मजबूत दिखाना चाहती, तो फिर नए आंकड़ों में consumption को पुराने आंकड़ों की तुलना में कमजोर क्यों दिखाया गया?

Consumption को मापना वैसे भी आसान नहीं है और नई series में इसे नीचे revise किया गया है। दूसरी तरफ independent data से पता चलता है कि investment में बढ़ोतरी हुई है और investment सीधे GDP में योगदान करता है।

भल्ला ने यह भी कहा कि भारत के national accounts तैयार करने वाले statisticians उन सबसे conservative statisticians में हैं जिन्हें उन्होंने अपने करियर में देखा है।

GDP Revision को नीलकंठ मिश्रा ने कैसे समझाया?

नीलकंठ मिश्रा ने revision की प्रक्रिया को practical तरीके से समझाया।

तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था, जिसमें informal sector का बड़ा हिस्सा हो, उसे कुछ वर्षों के बाद अपने base और calculation methods को reset करना पड़ता है। भारत में करीब एक दशक से कोई proper reset नहीं हुआ था।

जब नई surveys और नई source data को calculations में शामिल किया जाता है, तो कुल आंकड़े ऊपर भी जा सकते हैं और नीचे भी।

यही वजह है कि पुरानी series और नई series की सीधी तुलना करना सही नहीं है। दोनों में methodology और inputs अलग होते हैं। यानी यह बिल्कुल apples-to-apples comparison नहीं है।

नई series के तहत nominal GDP करीब 4 प्रतिशत नीचे revise हुआ है। मिश्रा का सवाल था कि अगर सरकार का मकसद GDP को मजबूत दिखाना होता, तो वह nominal GDP को नीचे क्यों करती?

Downward revision का एक बड़ा हिस्सा services sector से आया, खासकर trade, hotels और informal economy से जुड़े हिस्सों से। पुरानी calculation में यह assumption ज्यादा मजबूत था कि informal sector भी formal sector की तरह ही लगभग उसी दिशा में चलता है। नई जानकारी के बाद यह assumption उतना मजबूत नहीं रहा।

मोंटेक सिंह अहलूवालिया की राय

मोंटेक सिंह अहलूवालिया भी इस बात से सहमत थे कि 2.5 या 2.6 प्रतिशत की alternative calculation सही नहीं बैठती, अगर उसमें पुरानी और नई series को मिलाया जाए।

हालांकि उन्होंने quarterly GDP numbers को लेकर सावधानी बरतने की बात कही।

उनके मुताबिक quarterly आंकड़े हमेशा preliminary information पर आधारित होते हैं। इसलिए सिर्फ पहली तिमाही के आंकड़ों को देखकर यह घोषित नहीं किया जा सकता कि पूरे साल की economy कैसी रहने वाली है।

लेकिन उन्होंने एक technical सवाल जरूर उठाया। भारत में base changes के बाद GDP को अक्सर नीचे revise किया जाता है, जबकि कुछ दूसरे देशों में base revision के बाद GDP ऊपर भी revise होता है।

उनका कहना था कि जब statistics department की तरफ से पूरी details सामने आएंगी, तब economists को यह ध्यान से देखना होगा कि भारत में ऐसा क्यों हो रहा है।

फिर भी अहलूवालिया इस बात को स्वीकार नहीं करते कि 7.8 प्रतिशत की growth को जानबूझकर बनाया गया है।

क्या भारत ने doomsayers को गलत साबित कर दिया?

बड़ी तस्वीर पर आते हुए सवाल यह था कि क्या भारत ने उन लोगों को गलत साबित कर दिया जो अर्थव्यवस्था को लेकर लगातार pessimistic रहे हैं?

नीलकंठ मिश्रा ने कहा कि उन्हें पूरे साल की growth करीब 7.5 प्रतिशत रहने की उम्मीद पहले से थी। इसलिए 7.8 प्रतिशत उनके लिए कोई बड़ा surprise नहीं था।

पिछले साल fiscal और monetary headwinds थे। जैसे-जैसे ये दबाव कम होते हैं, global economy में मुश्किलें बने रहने के बावजूद growth में तेजी आ सकती है।

मोंटेक सिंह अहलूवालिया ने इसे थोड़ा अलग तरीके से देखा। उनके मुताबिक यह कहा जा सकता है कि भारतीय अर्थव्यवस्था उन doomsayers के अनुमान से ज्यादा resilient दिखाई दे रही है।

अगर पूरे साल की growth 7.8 प्रतिशत के बजाय करीब 7 प्रतिशत पर भी आती है, तो भी यह ज्यादातर बड़ी developing economies की तुलना में तेज होगी।

लेकिन उनका कहना था कि सिर्फ एक मजबूत quarter देखकर आराम से बैठ जाना सही नहीं होगा।

“You can’t look at these data and say, ‘I told you so.’”

उनके मुताबिक अब बातचीत सिर्फ reforms की सामान्य चर्चा तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। यह तय होना चाहिए कि आखिर किन चीजों को ठीक करने की जरूरत है—private investment, institutions और वे सभी factors जो यह तय करेंगे कि भारत की growth सिर्फ एक quarter तक मजबूत रहती है या आने वाले कई वर्षों तक ऊंची बनी रहती है।

पीएम मोदी ने भी साधा निशाना

GDP के आंकड़े सामने आने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी sceptics पर निशाना साधते हुए कहा कि doomsayers doomed हो गए और India फिर से bloom कर रहा है।

राजनीतिक तौर पर यह बयान अपनी जगह है। लेकिन इस चर्चा में शामिल economists बार-बार एक ही बात पर लौटते रहे।

7.8 प्रतिशत का आंकड़ा fake नहीं है।

GDP revision की प्रक्रिया जटिल है क्योंकि भारत जैसी बड़ी informal economy को accurately measure करना खुद एक मुश्किल काम है।

पुरानी और नई series को मिलाने से confusion पैदा होता है और कई बार यह confusion राजनीतिक हेरफेर जैसा दिखाई देने लगता है, जबकि उसके पीछे technical reasons हो सकते हैं।

साथ ही एक मजबूत quarterly GDP number का मतलब यह भी नहीं है कि भारत की सभी आर्थिक चुनौतियां खत्म हो गई हैं।

Jobs, investment की quality और deeper reforms अभी भी बड़े मुद्दे हैं। खासकर अगर Viksit Bharat का लक्ष्य वास्तव में हासिल करना है, तो इन क्षेत्रों में लगातार काम करना होगा।

आखिर इस GDP विवाद से क्या निकलकर आया?

फिलहाल तस्वीर यही है।

कोई बड़ी conspiracy नहीं दिखती। GDP growth को पूरी तरह खारिज करने की भी वजह नहीं है।

आंकड़ों को ध्यान से पढ़ने की जरूरत है। Revisions technical कारणों से होते हैं और भारत जैसी बड़ी informal economy में GDP को measure करना आसान नहीं है।

भारत की economy इस समय उन सबसे खराब forecasts की तुलना में बेहतर प्रदर्शन कर रही है, जिनमें बेहद कमजोर growth की उम्मीद जताई गई थी। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि आगे कोई चुनौती नहीं है।

बहस आगे भी जारी रहेगी। GDP के आंकड़ों के साथ ऐसा अक्सर होता है।

लेकिन national accounts पर दशकों तक काम कर चुके इन economists की बात का सार यही है कि इस बार GDP data के पीछे political manipulation का आरोप मजबूत सबूतों पर खड़ा नहीं होता।

आंकड़ों को समझने के लिए पुरानी और नई series को अलग रखना होगा, revisions के कारणों को समझना होगा और एक quarter के प्रदर्शन को पूरी economy की अंतिम तस्वीर मानने से बचना होगा।

स्रोत: India Today (Anand Singh की 4 सितंबर 2026 की Rajdeep Sardesai Roundtable रिपोर्ट); Business Today की इसी चर्चा पर coverage; India Today TV debate के दौरान Surjit Bhalla, Montek Singh Ahluwalia और Neelkanth Mishra के बयान; Subhash Chandra Garg की GDP revision पर पहले की टिप्पणियां; Ministry of Statistics and Programme Implementation की official GDP releases।

@रोहित मनराल

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